सुलह - दिनेश पाण्डेय

आईं तनी नगीच।
पँजरे बइठीं।
कुछ कहीं,
कुछ सुनबो करीं।
अधछुट बा जे गाथा कहनीं
टप्पा धरी।
एकरे अलमें जिनिगी-जाड़
अनगिन जंगल तुंग पहाड़,
अनगैरी दुर्गम रहता के मिलके काटीं।
सुखम-सितम जवने भेंटत बा
भोगीं, बाँटी।
माया रचले बाड़े कतिने
सोना मिरिग मारीच।

पुरुखन के ई सीख
गेंठी बान्हीं -
आपन कहल, अनकर सुनल,
आँतरमन के चाह-बिथा के
बूझल, गुनल,
छाँटेला अन्हियार हिया के।
निगरे सबहीं खार जिया के।
नेह अमल झकझक पानी में
जिया जुड़ाईं,
लोभ सवारथ, अहम भाव के
अतल बुड़ाईं।
हम हमार के कुरुखेत में
काहे कटी फरीक?
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लेखक परिचयः
नाम: दिनेश पाण्डेय,
आवास संख्या - 100 /400,
रोड नं 2, राजवंशीनगर, पटना - 800023.
मो. न.: 7903923686

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