का ए बकुला - सुरेश कांटक

का ए बकुला
कब ले आपन
असली रूप छिपइबऽ
किसिम किसिम के भेख बना के
मछरिन के भरमइबऽ
का ए बकुला!

बड़े दिनन से
दह में आपन
पाँव जमवले बाड़ऽ
राम नाम के चद्दर ओढ़ले
जाम उड़वले बाड़ऽ
कब ले धोखा देबऽ बोलऽ
कब ले भेद ब इबऽ
का ए बकुला!

धरमात्मा के खोल
ओढ़ि के
चलेलऽ धीरे धीरे
पलखत पावते
लीलेलऽ मछरी
गंग जमुन के तीरे
घड़ियाली लोर वा से कब ले
मछरिन के भरमइबऽ
का ए बकुला!

घोंघा, सितुहा, गिन ई, पोठिया
खालऽ, बनेलऽ हंस
मछरिन के
बचवन के हति के
अरे कसाई कंस
मगरमछन से
कब ले बोलऽ
मछरिन के हरवइबऽ
का ए बकुला!

ऊजर बग बग पाँखि
टाँग बा लमहर
लमहर चोंच
जब ले दह में
पाँव जमवलऽ
दीहलऽ सभ के नोच
करम, कुकरम कके कबले
बगुला भगत कहइबऽ
का ए बकुला!

मगरमछन, कछुअन,घड़ियारन
के अँगुरी पर नाचेलऽ
काँपेलऽ
सोंसन से थर थर
ओकरे धन बल बाँचेलऽ
कबले कहर
गिरइबऽ बोलऽ
कब ले नाच नचइबऽ
का ए बकुला!

धनुही संग
निकलिहें लरिका
नियराइल बा घरी
सभ मिलि तोहके
सबक सिखाई
तोहरो टाँग पक अड़ी
फाटी पेट कँहरबऽ काका
टूटी टाँग चिलइबऽ चाचा
आ सुरधामे जइबऽ
का ए बकुला!
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लेखक परिचयः
नाम: सुरेश कांटक
ग्राम-पोस्ट: कांट
भाया: ब्रह्मपुर
जिला: बक्सर
बिहार - ८०२११२

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