चलऽ फुलेसर रङ्ग उड़ावऽ - सुभाष पाण्डेय

चलऽ फुलेसर रङ्ग उड़ावऽ।

सुख-दुख लागल रही उमिर भर,
कुछ दिन त आनन्द मनावऽ।
चलऽ फुलेसर, रङ्ग उड़ावऽ॥

धरती पहिन पिअरकी साड़ी
फगुआ के कइली तइयारी
हरियर ताज गाछ का माथे
तीसी, मटर रङ्ग ले हाथे
छरकि-छरकि सबका पर डाले
तुहुँ चहकि के चहका गावऽ।
चलऽ फुलेसर, रङ्ग उड़ावऽ॥

काका, काकी खेले फगुआ
गारी गावे लगुआ-भगुआ
सभे रङ्गाइल, जानि परे ना
के बबुनी, के हउए बबुआ
देखऽ, भउजी झाँकत बाड़ी
पोति अबीर जोगीरा गावऽ।
चलऽ फुलेसर, रङ्ग उड़ावऽ॥

बुधना बाबू के चोटिआवे
हाड़ फोरि लगलें गरिआवे
केतनो भगलें भागि ना पवलें
पटकि के गोलुआ रङ्ग लगावे
भिजलें, मनलें, कहलें बाबू
ए मलिकाइन! पुआ खिआवऽ।
चलऽ फुलेसर, रङ्ग उड़ावऽ॥

पिछिला बेर रिसिआइल रहलऽ
निमन-बाउर केतना कहलऽ
तब्बो भुवरा, दुअरा आइल
तजऽ लजाइल आ रिसिआइल
सभे मस्त बा, मस्त रहे दऽ,
दिल के तू दरिआव बनावऽ।
चलऽ फुलेसर, रङ्ग उड़ावऽ॥
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लेखक परिचय:-
नाम: सुभाष पाण्डेय
ग्राम-पोस्ट - मुसहरी
जिला-- गोपालगंज बिहार

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