सपूत - दिनेश पाण्डेय

बइठल-बइठल अंडा पारे,
हद अलहद्दी!
हूनरवंता हाड़ ठठावे,
ई रजगद्दी।

चूल्हा दे रे, चक्की दे रे,
अवरि रुपैया।
कर्जा-वर्जा माफी दे दे,
नतु तनखैया।

समता, समरस भाँड़ भुँजाए,
जेठ-हेठ करीं।
चाभऽ तू नकबोल बुड़ा के,
हमूँ इचि चरीं।

मरे नीति तऽ कथी फिकिर बा,
धरन ध द चड्डी।
तरिगर ना तऽ छाल्ही चाभऽ
लबा-दुआ हड्डी।

ऊपर से चिक्कन बन घूमऽ,
कवन ताके तर?
गज भरि के उपवीत कान पऽ
तुरी छर्राछर।

लोकतंत्र के डफली कूटऽ,
गावऽ जनमन।
केकर हिम्मत, कथी बिगारी
कथी के खखन?
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दिनेश पाण्डेय



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