दुरजन पंथ - दिनेश पाण्डेय

गसल निठुरता
हद गहिरोर
पोरे-पोर।
पोंछ उठवले हरदम सगरी,
सींघ लड़ावे के तत्पर।
सकल उधामत चाहे करि ल
जीति ना पइब कबो समर।
अनकर माल-मवेसी, धनि पऽ
निरलज आँखि उठावे,
सुजन बंधु सन इरिखा पारे,
दुरजन जान सुभावे।

पढ़ल-लिखल भल सुकराचारी
ताने रहे।
कतो बिछंछल मनियारा के
कवन गहे?

गने मंदमति धुर विनयी के
ब्रतधारी पाखंडी,
भलमानस के कपटी भाखे,
तेजसवंत घमंडी,
बीर बाँकुरा बड़ निरदइया,
मुनि सनकी घरनाँसी,
दीनहीन भोला मिठबोला,
बड़ बकता बकवासी,
धीर-गँहीर पुरुख अलचारी,
गुनवंता गुनहीना,
कवन सुजन नामी के जग में,
दूसे दुस्ट कभी ना।

अउ अवगुन का लोभ भरल जब,
चुगली तब अधमाई का?
का तप, जब बा सत्यवादिता,
मन सुचि तिरिथ घुमाई का?
भलमनसी तऽ कवन आन गुन,
साज-सँवार सुनामा का?
सद् विद्या तब का धन चाहीं,
कवन मरन बदनामा का?

दिने धुँआइल चान,
ढलल बय सरम बिहूनी,
राँड़-तलैया जल बिन सूनी,
निपढ़ पुरुख सुन्नर सुभ भेखे,
धन संगरिहा राजा देखे,
सज्जन लो' बदहाली झेले,
उचरुंग, लंपट, बकवादी जन
राजसभा में खेले,
कइसे नीमन लागी हो?
कबले लोगवा जागी हो?
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दिनेश पाण्डेय



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