कतिना पानी - दिनेश पाण्डेय

ठोरे खने धूर,
एने-ओने घूर,
फुर्र-फुर्र-फुर्र।
गड़ही में पानी,
कउआ असनानी,
छुपुर-छुपुर।

भर घुट्ठी पानी,
तहँ अकिल नसानी,
थह-थह रुक।
जब हँसी क सुजोग
त ना हँसिहन लोग?
खिहि-खिहि-खुक।

न चले के सऊर,
ना मिटले गरूर,
गिरल भहर।
रचल महाभारत,
होखल सब गारत,
मचल कहर।

नदिया जे थाही,
तर तल बलुआही,
झकझक जल।
जिय जगन जुरा लीं,
तन तपन सिरा लीं
थकन सकल।

जहाँ कुक्कुरलँघन,
उहाँ उघरे जघन,
एहर-ओहर।
जहँ हथियाडुबान,
नद लिहले उफान,
सजग सुतर।

छाती-छाती जल,
लग घाट-बाट भल,
अमल-अमल।
तलई क भीतरी,
छरपेली मछरी,
छहल-छहल ।

आँखि रखीं पानी,
हर दिल दरियानी,
सुगम सुगत।
चुरू में समुन्दर,
सरगो ले सुन्दर,
सकल जगत।
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दिनेश पाण्डेय


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