नेता काका - प्रभाकर पांडेय

नेता काका, भले हमरे काका हउअन पर उनकर असली नाव हमरो पता नइखेे। एकर कारन बा की हम जबसे होस संभरले बानी गाँव-जवार, हित-नात सब केहू की मुहें उनके नेते-नेते कहल सुनले बानीं....हँ कुछ लोग उनके दरबरियो कहेला। दरअसल एक बेर के बाति ह की चुनाव में नेता काका स्व. राजमंगल पाणे के परचार करत रहने। ओ ही बीचे उ एक बेर कवनो अउर नेता की परचार में देखि लेहल गइने। अब ए में नेता काका के कवन दोस बा, उ केहू के मनो त ना क सकेने। अब जब स्व. राजमंगल पाणे के इ बाति मालूम चलल त उ नेता काका के बोलववे अउर कहने की ए दरबारी असली नेता तूँ ही बाड़S। हमनीजान त तोहरा आगे फेल बानी जाँ। तब्बे से दरबारी काका नेता काका हो गइने। हँ एगो अउर बात, नेता काका के नाम नेता एहियो से पड़ि गइल की जब से उ होस धइने, पाजामा-कुर्ता अधिका पहिनेंने।

इनकरी नेतागीरी के एगो अउरी घटना (25-30 बरिस पहिले के) सुनीं। एक बेर पडरवना में कुछु के उदघाटन होखे के रहे। उदघाटन करे खातिर देउरिया से कवनो नेता जाए वाला रहनें। नेता काका, ओ नेता के देखले रहने। नेता काका के कवनो संघतिया से पता चलल की जवन नेता आवे वाला बा उनके केहू अबहिन देखले नइखे अउर जे देखले बा उहे ले आवे गइल बा। अब देखीं नेता काका के मनबढ़ई भा कहि लीं लंठई। नेता काका कुर्ता पायजामा त हरदम पहिनलहीं रहें। 5-6 गो संघतियन के लेहने अउर एगो संघतिया की जीपे पर बइठि के उहां पहुँचने और नेता बनि के फीता काटि के उद्धाटन क देहने। चाय-ओय पी लेहने, लोग में मिठाई आदि बँटि गइल, सब लोग अपनी-अपनी घरे चल देहल। जब देउरिया से उ नेता पहुँचने त का देखताने की फीता-उता त कटा गइल बा। अब त आयोजकन कुल के बड़ी रीस बरल...उ पूरा पडरवना में नेता काका के खोजि देहने सन पर उनकर कहीं पता ना चलल...अरे पता का चली नेता काका त बस ध के घर की ओर चलि दे ले रहने। ओ बेरा नेता काका के इ कारनामा जे जे सुनल हँसत-हँसत गिरि गइल। जब ए बाति के जिक्र होला त नेता काका कहने, ‘दुरबुरबक, लोग के परेसानी हमरा से देखल नाहीं गइल, देउरिया से पता ना कब नेता अइतें अउर फीता कटतें, ए से हम जनता के परेसानी कम क देहनी। फितवे न काटे के रहे, केहू काटि देव।’

नेता काका की लड़कपन के एगो घटना सुनीं। नेता काका, स्कूले से बड़ी छुट्टी मारें। पढ़े जाँ त कुछ लइकन कुल की संघे रस्तवे में एगो बारी (बगीचा) पड़ें, ओही में रुकि के चिक्का, कबड्डी आदि खेले लागें। एक बेर गाँव के केहू ओ ही रास्ता से हो के बाजारे जात रहे। उ बारी में ए लोगन के खेलत देखलसि, त जब बाजारे से लवटल त नेता काका की बड़ भाई से इ बाति कहि देहलसि की नेता त दिनभर बारी में खेलताने। अब नेता काका के बड़ भाई, नेता काका पर घोंघिया के चढ़ि बइठने, मारे दउड़ने, ए पर नेता काका कहने की आजु स्कूले त हम गइलहीं रहनी हँ, पर प्रिंसिपल साहब के माई मरि गइली ह, ए से छुट्टी हो गइल ह।

दूसरा दिने नेता काका के बड़ भाई नेता काका के ले के स्कूले गइने अउर प्रिंसिपल साहब से सब बात बतवने। जब प्रिंसिपल साहब सुनने की नेतवा त हमरी जीयते माई के मुआ देहलसि त बहुत रिसिअइने अउर पैना उठा के नेता काका के खूब धुलाई कइनें। पर संजोग देखीं की ओ बेरा प्रिंसिपल साहब के माई बेमार चलत रहली अउर 5-6 दिन में खटिया ध लेहली अउर पंद्रहो दिन ना बितल की भगवान के पेयारा हो गइली।

नेता काका के लंठई बचपने से हिलोर मारत रहल ह, अउर आजुवो 52-55 की अवस्था में उनके हँसोड़ कारनामा होते रहेला। एगो अउरी बात सुनीं, हमरी जवार में एगो शेरपुर जगहि बा, जहाँ माई दुरुगा के थान बा। माई बहते जगता मानल जाली। नौरातन में खूब मेला लागेला अउर दूर-दूर से लोग इहाँ आवेला। हमरियो गाँव के बहुत लोग इहाँ जाला अउर कढ़ाई-ओढ़ाई चढ़ावेला। आजु त लोग इहाँ टेक्सी आदि से जाता पर पहिले गाँव के लोग आपन-आपन बैलगाड़ी ले के जा। भिनसहरे 2-3 बजे गाड़ी नधा जाँ कुलि अउर भोर होत-होत लोग शेरपुर पहुँचि जा।

एक बेर नेतो काका कुछ बुढ़ मेहरारू कुल के लेके भिनसहरे शेरपुर चलि देहने। ओही में नेता काका के माई अउर उनकर 2-3 जाने काकीओलोग रहे। नेता काका के बैल एकदम नया रहनेसन अउर इ, सब गाड़ी कुल के फनावत अपनी गाड़ी के दउरावत सबसे आगे निकलि गइने। नेता काका एतना तेज गाड़ी दउरवने की आगे जा के गाड़ी पलथा मारि देहलसि अउर सब मेहरारू गिरि गइनीसन। नेता काका की माई के सबसे अधिका घाव लागल रहे। उ बेहोस हो गइल रहली, तब्बो नेता काका हमरी गाँव की गड़ुआनन अउर मेला जाए वाला लोग से कहें की माई त हँसतिया। तोहS लोगन झूठहीं परेसान बाड़S जा।ओकरी बाद गाँव के लोग दवा-ओवा करा के सब मेहरारुन कुल के घरे ले आइल। नेता काका के बहुत डाँट परल।

अब सुनी, नेता काका के सबसे दमदार किस्सा। एक बेर नेता काका गाँवभरि की कुछ पुरनियन मेहरारू कुल के ले के इलाहाबाद नहवावे निकलने। उ दउरियाँ ले आके ओ सबके टरेन में चढ़ा के भटनी ले गइने अउर उहाँ से बरहजिया टरेन से सब मेहरारू कुल के ले के बरहज पहुँचि गइने अउर काकी, माई जे भी रहे ओ से कहनें की इलहाबाद संगम आ गइल। अब फटाफट नहा ल जा। ओ में से कुछ का अधिका मेहरारू कई बेर इलाहाबाद गइल रहनीसन त कवनो कहे की ए नेता, उ पुलवा त लउकते नइखे हो, त कवनो कहे की इहाँ त भीड़ों नइखे, ना त हर साल केतना भीड़ होत रहल ह, त कवनो कहे की ना, इ इलहाबाद ना ह, एतना जल्दी हमनीजान कवनेंगा पहुँचि गइनी हँ जा त नेता काका धीरे से बुदबुदइने, अरे सब नदिया एक्के हईंसन अउर ओकरी बाद कहताने की तोहूँ लोग पिछला सालन के बात ले के बइठल बाड़S जा, एतना तेज बाढ़ि आइल रहल ह की पुल-सुल सब दहि गइल अउर गंगाजी एन्ने से बहे लगली। असली संगम पर गइले के मनहाई बा, ए से जल्ली-जल्दी इहवें नहा ल जा अउर पूजा पाठ क के जल्दी से घरे भागि चलजा, ना त इहवों नहाए के ना मिली, अउर हँ, हम तोह लोगन के शाट-कट से तेज चले वाली टरेन से ले के अउनी हँ, एसे फटाक से पहुँचि गइनी हँ जा। एकरी बाद सब मेहरारू लोग उहवें नहाइल-धोवल, पूजा-पाठ कइल अउर घरे चलि आइल।

नेता काका के काम-धाम से सब लोग बहुते खुस रहेला। उ केहू के बुरा कबो का, सपनो में नाहीं चाहि सकेने। गाँव में केकरियो घरे जगि-परयोजन रही त उहाँ नेता काका आपन उपस्थिति जरूर दर्ज करेने। जब खाए खातिर पंघति बइठि त नेता काका परोसे खातिर तइयार हो जइहें, लोग मना करी की ए नेता तूँ राहे द, लइका बानेसन न खिया दीहें सन पर नेता काका मनीहें ना अउर कुछ ना पइहें त पतले,गिलासे आदि चलावल सुरु क दीहें। बीच-बीच में लोग के पकड़ि-पकड़ि के पंघति में बइठइहें अउर कहल करींहे, ए बाबू तूँ हूँ खा ल हो, पहिले खा लS, फेनु खिअइह.... तूँ बइठS, हम परोसतानी।
नेता काका की हाथे में चलावे खातिर अगर कवनो सब्जी आ गइल त रउआँ कवनो हालत में मना ना क सकेनी..रउआँ लेबहीं के परी। केहू पूछी की नेताजी,रउआँ कवन सबजी लेले बानी त कहिहें, तोहके कवन चाहीं, अगर रउआँ कहनी परोरा त झट दे कहिहें की परोरे के त ह...अउर रउरी पतले में तनि दे दीहें। लउकी के सब्जी चलइहें त कहल करिहें, काका चाहें बाबू (उमिर की हिसाब से), ल काका तनि हई कटहर के सबजी चेक करS, बहुते बढ़िया बनल बा...इ कही के पतले में लउकी के सबजी दे दीहें।। खैर नेता काका के कवनो जगि-परयोजन में शामिले भइल एगो आनंद के विसय होला...हर आदमी कमर में गमछा बाँधि के हर काम में खुशी से लागि जाला। अगर नेता काका कहि दें की ए बाबू तनि इहाँ के सबजी द हो त 3-4 गो लइका दउड़ी के सबजी ले के उहाँ पहुँचि जइहें...अउर पूछिहें...के के ए नेता काका????
हँ एतने ना गाँव में बहुत बेर एइसन होला की कुछ घर के कुछ घर से खान-पान नाहीं होला, ए में नेतो काका के घर बा पर इ नियम नेता काका पर लागू ना होला। उ सबकी घरे खाने अउर ए बाति के बुरा उनकरी घरवों के लोग ना मानेला। हँ कबो-कबो उनकर बड़ भाई रिसिअइहें पर नेता काका हँसि के टारि जइहें।। जय हो नेता काका की।
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नेता काका - प्रभाकर पांडेयलेखक परिचय:-
नाम: प्रभाकर पांडेय
जन्मतिथि- 01.01.1976
जन्मस्थान- गोपालपुर, पथरदेवा, देवरिया (उत्तरप्रदेश)
पिता- स्व. श्री सुरेंद्र पाण्डेय
शिक्षा- एम.ए (हिन्दी), एम. ए. (भाषाविज्ञान)




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