शिवा नहीं खेल रहे होरी - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

चिता भसम लिए हाथ
शिवा नहीं खेल रहे होरी॥
अजुवो हौ प्रेतन को साथ
शिवा नहीं खेल रहे होरी॥

सगरों मिलावट नाही भावत
खोरिन केहू फाग ना गावत
अनही लहक रहल हौ बात
शिवा नहीं खेल रहे होरी॥

भलही डमरू हाथ विराजत
भलही संपवा हौ फुफकारत
लागल उहाँ कवन आघात
शिवा नहीं खेल रहे होरी॥

रिस्ता नाता भइल पुराना
आपन सभे बनल बेगाना
दिनही भइल अन्हरिया रात
शिवा नहीं खेल रहे होरी॥

मन मनई के जरत हौ अबहूँ
घाट के चिता बुझत ना कबहूँ
घाहिल शंकर के जजबात
शिवा नहीं खेल रहे होरी॥
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लेखक परिचय:-
नाम: जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
संपादक: (भोजपुरी साहित्य सरिता)
इंजीनियरिंग स्नातक;
व्यवसाय: कम्पुटर सर्विस सेवा
सी -39 , सेक्टर – 3;
चिरंजीव विहार , गाजियाबाद (उ. प्र.)
फोन : 9999614657
ईमेल: dwivedijp@outlook.com
फ़ेसबुक: https://www.facebook.com/jp.dwivedi.5
ब्लॉग: http://dwivedijaishankar.blogspot.in

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