अइबऽ ना घरे जो बलमुआ - दिलीप कुमार पाण्डेय

अइबऽ ना घरे जो बलमुआ
लहुरा लीहें लहरा लूट॥

आंजर रंगिहें पांजर रंगिहें,
जीव अकेल कहऽ कइसे बचिहें।
मुंह रंगी झरिहें लो रूप हो,
अइबऽ ना घरे जो बलमुआ
लहुरा लीहें लहरा लूट॥

टिकवत बारें पर्हे से देवरा,
मलिहें अबीर मिलाई केवड़ा।
मोका पाई परिहें लो टूट हो,
अइबऽ ना घरे जो बलमुआ
लहुरा लीहें लहरा लूट॥

पिया पैनाली हो दउरल आवऽ,
गोरी के अपना सरधा पूरावऽ।
करिहें गजनी मिलते छूट हो,
अइबऽ ना घरे जो बलमुआ
लहुरा लीहें लहरा लूट॥।
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लेखक परिचय:-
नाम - दिलीप कुमार पाण्डेय
बेवसाय: विज्ञान शिक्षक
पता: सैखोवाघाट, तिनसुकिया, असम
मूल निवासी -अगौथर, मढौडा ,सारण।
मो नं: 9707096238

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