जिंदगी - तारकेश्वर मिश्र 'राही '

दिया के अजोर ह ई जिंदगी।
नदी के तरंग ह कि खेल के पतंग ह।
कि मेला के शोर ह ई जिंदगी।

चार दिशा गन्ध उठे फूल क पराग ह,
कि सावन में भरल पुरल बेइला के बाग ह,
नैना के नीर ह कि चुकी गईल तीर ह,
कि नदी के हिलोर ह ई जिंदगी?

रात दिन की खम्भा पर खड़ा शामियाना,
कि तुलसी की माला के इनल गिनल दाना,
पूजा के थार ह की वीडा के तार ह,
कि हवा के झकोर ह ई जिंदगी?

जहाँ तहा उड़त फिरे धरती के धूल ह,
कि छुअते लजाई गईल छुई मुई फूल ह,
दियना के तेल ह कि पुतरी के खेल ह,
कि आग के ढिढोर ह ई जिंदगी।
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तारकेश्वर मिश्र 'राही'तारकेश्वर मिश्र 'राही'

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