मेहरारू आउर पिंजरा - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

रोज पिंजरा मे दरद सहत
टूटल हियरा जोरत
ओकरे पीर ढोवत
डहकल परान
फतिंगा नीयन बुझानी मेहरारू।

उ मनई रहे
जवन आकास त दिहलस
बाकि पतंग के डोर
अपनही पकड़ के राखस
मेहरारू बुझेनी ओकरा
आपन घर आउर घरौंदा।

उ मनई रहे
जवन बेदरदी नीयन
रौंद के मुस्किया दिहलस
मेहरारू सोचत रहे
खुलल आकास मे उड़ल।

उ मनई रहे
जवन काट दीहलस
ओकर पांख
बन्द क दिहलस ओकरा
पिंजरा मे।

मेहरारू बन्द पिंजरा मे
सातों जनम इहवें पूरा करेलीं
फेरु सोचेलीं उतारल बोझ
तब सोचेलीं अपना के निखारल
चाहेलीं उड़ल तितली नीयन
चाहेलीं सुख चिरई लेखा
बाकि उहो चाहत मरि जाले
ओही पिंजरा मे।
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जयशंकर प्रसाद द्विवेदीलेखक परिचय:-
नाम: जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
संपादक: (भोजपुरी साहित्य सरिता)
इंजीनियरिंग स्नातक;
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