बनल रहे बिसवास - सिपाही सिंह 'श्रीमंत'

बनल रहे बिसवास बटोही, धीमा पड़े न चाल
मंजिल दूर, थथम के बइठल, भाई रे, बा काल
खाली सपना काम ना आई मन मोदक से भूख ना जाई
बुनी पकड़ के चढ़ल गगन में अइसन केहू नाम न पाई

बाजी मरलस उहे, कि जे तेरुआर धार पर दड़रल,
देख बिछल अंगार राह में, मन में तनी न मउरल
मन के जीते जीत बटोही, मन के हारे हार,
बल बटोर से बढ़त गइल जे, सेही चहुँपल पार

जे कदराइल, से भहराइल, सहुरल ना ऊ लाल
मंजिल दूर, थथम के बइठल, भाई रे, बा काल
उनहल देख नदी के, सिहरल, कइसे जाई पार
दुबिधे में रह गइल, किनारे पर बइठल मन मार

रोअत रही बइठ उहँईं ऊ हाथे पकड़ कपार
बातो पूछे पास न आई कायर के संसार
कि चूमी चरन, नवाई माथ, ई दुनिया हरदम तइयार,
लेकिन कायर के ना, मरदाना के, जे ना माने हार

जे ना माने हार, हथेली पर ले घूमे प्रान
टूटे त टूटे लेकिन ना झूके वीर जवान
बहत रहे तूफान राह में, हहरत रहे समुन्दर,
पकड़ पथिक पतवार हाथ में, का कर सकी बवंडर,

हिचक हटा के ढीठे ले चल, नाव उड़ा के पाल,
मंजिल दूर, थथम के बइठल, भाई रे, बा काल
कइसे के पाई गुलाब, जे काँट देख के काँपे,
मोती भला मिली कइसे, बाहर से पानी नापे

काँटन में गमके गुलाब, गहिरे पानी में मोती,
जहरीला मनियारा का पाले बा मनि के जोति
प्यार काँट के जे कर पाई, सूँघी उहे गुलाब,
गहरे पानी पइठ सकी, पाई मोती के आब

मोह माथ के छोड़ चली जे, मनियारा का पास
ओकरे बा अधिकार कि ऊ, कर पाई मनि के आस
कूद सकी जे कालीदह में, नाथ सकी जे नाग,
बजा सकी बाँसुरी, जगत के जीत सकी अनुराग

सनमुख उगिलत जहर नगिनिया, चाहे धधकत आगी,
बढ़ी लक्ष्य पर डेग, त संकट खुदे डेरा के भागी
पथ के बाधा देत चुनौती, तेज करे के चाल
मंजिल दूर, थथम के बइठल, भाई रे, बा काल
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सिपाही सिंह 'श्रीमंत'

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