जिनगी के बोझ - नूरैन अंसारी

केतनो रोई बाकिर,अखिया लोरात नइखे!
दुःख दईबा रे ,जिनगी से ओरात नईखे!

कर देहलस बेभरम महंगाई आदमी के,
बोझ जिनगी के ढोवले ढोवात नइखे!

कबो बाढ़ आईल त कबो सुखाड़ ले गईल,
अब खेत कौनो, मन से बोवात नइखे!

खेतिहर मौसम के मार से टुअर-टॉपर भईल,
महल मड़ई पे तनको मोहात नइखे!

जहिया रहे जरूरत त तकबो न कईलेन,
आज बेमतलब के सटल सोहात नइखे!

"नूरैन" भीतर के मार लोग भीतर सहत बा,
सगरी बात पंच के आगे खोलात नइखे!
----------------------------------------------------
लेखक परिचय:-
नाम: नूरैन अंसारी
नोएडा स्थित सॉफ्टवेयर कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर
मूल निवास :ग्राम: नवका सेमरा
पोस्ट: सेमरा बाजार
जिला : गोपालगंज (बिहार)
सम्पर्क नम्बर: 9911176564
ईमेल: noorain.ansari@gmail.com

1 टिप्पणी:

मैना: भोजपुरी साहित्य क उड़ान (Maina Bhojpuri Magazine) Designed by Templateism.com Copyright © 2014

मैना: भोजपुरी लोकसाहित्य Copyright © 2014. Bim के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.