धोबियापाट - चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह 'आरोही'

छेदी सिंह उत्तर तरफ से आवत रहन जबकि ऊ ओनही ओही गली में जात रहे. छदी ओकरा फुटलो आँखि ना भावस. पढ़ाई लिखाई साथे भइल. ओहि घड़ी केहू रहे आँख मिलाएवाला, सामना सामनी त छेदिए रहन. कवनो के बगईचा में घुसि के आम तूड़ लिहें, केहू के खेत में से बूंट उखाड़ लिहें आ अन्हार में भागत खा कह दिहें, 'चलऽ मोहन!' आ अतना जोर से कि रखवारो सुन ले. नतीजा होई दूसरा दिन उनकरा घरे ओरहन.

पढ़ाई छोड़ला के बाद दूनो आदमी अखाड़ा धइल बाकिर दू गो. एके गाँव दूगो अखाड़ा भइला से का भइल, एक से दोसरा जगे बात पहुँचे में देर ना लागत रहे. खबर मिली कि मोहन पांच सौ दण्ड करत बाड़े त छेदी सवा पांच सौ पूरा करके छोड़िहें. ... केहू कही कि छेदी के भईंस दू पसेरी दूध करत बिया, तब मोहनो ओइसने भईंस खरीदे में सप्ताहो ना लागे दिहें. गांव में एक से एक रंगबाज लोग बा. हर तरह के लोग बा. धनी आ गरीब. लंगा आ रइस. बाकिर एह दूनो जाना के आगा गाँव में दोसरा के चर्चा ना होय. दूनो जाना भिड़लन ना, बचावत गइले, बाकिर गाँव जानेला कि छेदी उनइस बाड़न.

लहालह दुपहरिया में मोहन सिंह बैद जी का घरे जात रहन. मतारी के बुखार लागत रहइन. छेदी सिंह का दुआर का आगा से जात रहन तब देखलें कि छेदी सिंह एगो बकरी के धइले सार में चलत जात बाड़े.

साँझ के समय रहिमन आपन हाल चाल कहिके रोवे लगलन, 'मँहगी के समय बा. करीब दू सौ के बकरी रहल हा. अनगुते छउड़ी चरावे खातिरले गइल रहे. ना जाने कहवाँ चल गइल? का भ गइल?'

मोहन के दुपहरिया के बात याद पड़ल. ऊ कहले, 'छेदी सिंह एगो बकरी बन्हले बाड़न. जाके देख त तोरे हऽ?'

ऊ दउड़ गइल. गोड़ हाथ पर के माफी माँग के, बकरी छोड़ा के ले गइल. आवत खा जे मिले ओकरे से कहे, 'मिल गइल, बाबू छेदी सिंह बन्हले रहन.'

दोसरा दिन से जे केहू देखो, मुस्काये लागे. ऊ पहिले धेयान ना दिहले, बाकिर बाद में जब मुस्की गढ़े लागल त मोहन सिंह से बदला लेबे के तय कर लेलन.
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मोहन सिंह के मन में आइल कि घुम जास, बाकिर घुमले ना आ बढ़त गइले. छेदी से अपना के हर तरह से बीस बुझऽले बाकिर इहो जानऽले कि छेदी के ढेर छल प्रपंच आवेला. दूनो आदमी एक दोसरा के सामने होखल ना चाहे बाकिर कवनो उपाय ना देखि के दूनो आदमी बढ़त गइल. गाँव घर का नाता से मोहन चाचा लगिहें. मोहन आँखि बन्द करके बढ़ल चहले बाकिर छेदी राह रोक के खाड़ हो गइले. मोहन अचरज भरल नजर से देखले तब छेदी, 'प्रणाम चाचा', कह के हाथ जोड़ देले.

मोहन आसीरबाद देके, बगलिया के बढ़े लगले तब छेदी फेर बोलले, 'काहे चाचा? नाराज काहे बाड़?'

'के कहल हा?'

'तब भागत काहे बाड़ऽ? का हम कवनो लड़की हईं कि केहू साथ देख ली तब नाक कटा जबव?'

'ना मरदे! एगो काम के जल्दीबाजी बा.'

'जोरु ना जाँता, खुदा मियाँ से नाता. काम के फिकिर तनी कम करऽ. हँसब ठठाई, फुलाईब गालू, एक साथ ना दुई होई ना भुआलू. ... शादी बिआह के बाद देखल जाई. कहल बा कि गला में ढोल परी तब बजावहीं के पड़ी. अबहीं काहे खातिर चिन्ता? चलऽ. आवऽ लगले लवटब.' कहत हाथ धर के घुमा देले. अब का करीतन? घुम के चल देलन.

छेदी सिंह एगो गरीब बुढ़ मियाइन के घर में घुस गइलन. मोहन जानत रहन कि बुढ़िया के एगो जवान बेटीयो बिया. दुआरी पर मोहन के थथमल देख के छेदी घुमले आ उनकरा के धकर के भीतर ले जा के एगो झिलंगा भइल खाटी पर बईठ रहले. बुढ़िया के छउंड़ी ओही पर सुतल रहे. चिहा के उठल आ अलग खाड़ हो गइल. मोहन का नीक ना लागल बाकिर चुपे रहलन.

बुढ़िया चार गो अंडा ले आके आगा में धर देलस. छेदी सिंह उठा के, मोहन का तरफ बढ़ावत कहले, 'एक अंडा एक पाव दूध के बराबर होला. किंगकांग रोज तीन दर्जन अंडा खात रहे. संसार भर के पहलवानन के रगड़ देले रहे. बहरी खइला पर पोंगा पंथी लोग मगज खराब करे लागी. एहिजे आके खाइला. तूहूं लऽ ना.'

मोहन सिंह ना खइलन. बुढ़िया के छउंड़ी शबीना के सादगी, सुघराई आ टुकुर टुकुर खामोशी के साथ ताकल उनकरा भीतरे बस गइल. छेदी सिंह के साथ आवत जात अंडा त खाहीं लगले, शबीना से कवनो नाता जोड़ले कि ना, ना कह सकीं. बाकिर छेदी सिंह के चेला लोग नमक तेल लगा के प्रचार कर देलन.

मोहन सिंह ददरी के मेला गइल रहन. छेदी सिंह एही बीच मियां सबके ललकार के शबिना के घर से निकलवा देलन. ऊ मोहन सिंह के दुआरी पर गइल तब मोहन सिंह के भाई दयाद लोग थूथू करे लागल आ ओकरा के दुआरी पर से उफरा परल कुत्ती अस दुर दुरा देहल.

गाँव से पश्चिम सड़क पर बस पर से मोहन सिंह के उतरत देख के छेदी चलले आ उनकरा साथे उनकरा दुआर पर चढ़ले. मोहन सिंह कोठारी में घुसे लगले तब ले पाछा से उनकर कमीज पकड़ के खींचले आ ऊ चिहा के घुमले.

'ई गाँव हऽ, सहर बाजार ना. इहाँ पर रहे के एगो तरीका होला. तू का चाहत बाड़?'

'मतलब?'

'हई लऽ! अब मतलबो बताये के पड़ी. कहीं? कह दीं जी?' छेदी सिंह मोहन के बड़ भाई का तरफ देख के कहले.

'का ?' खटिया पर सूतल रहन. बइठत बइठत पूछले.

'इहे कि शबीना आज एही घर में रहे आइल रहे. रउवा सभे ना रहे देनी हाँ आ दुर दुरा देनी हाँ.'

केहू कुछ ना बोलल. सब केहू एक दोसरा के कनखि से देखत रहे. उदासी, चुप्पी कुहरा अस गते सारो ओर से उतर के तह पर तह बइठत जात रहे. सब केहू समझत रहे कि आज कुछ अनहोनी हो के रही. बाकिर सोच ना पावत रहे.

मोहन सिंह के आइल सुन के सबिनो आ गइल. मोहन के भाई लोग के साथे जुट आइल कुछ अउरी राजपूत लोग शबीना के दुआर के आगा के चउतरा पर से धक्का मार के हटा देबे खातिर बढ़ल.

'रउवां सभे का करत बानीं? कुछुओ सोच समझ के करेके चाहीं. अइसन जोमाही ना करे के चाहीं जवना के चलते पाछे पछतावे के पड़े.' छेदी सिंह बोलले.

जहें के तहें लोग रुक गइल.

'ओकरा के बइठे दीं सभे. ....रउरा सभे तमासा मत करीं. मइला ना हऽ कि उठा के फेंक देब सभे आ बात खतम हो जाई. .. होने कोठरी में आईं सभे.' छेदी सिंह धर धर के टोल परोस के बाद घर के दस बीस आदमी के कोठरी के भीतर ले गइले.

सब ऊंच नीच, नरम गरम सोचला के बाद तय भइल. बात दबी ना. गाँवे रहला पर गाँव बसाए लागी. आरा में एगो मकान खरीदल जाय. बाबू मोहन सिंह उहें शबीना के राखस. जब तक मकान नइखे खरीदात शबीना मतारी का साथ रहस. उनकरा हिस्सा के खेतवन के मनी उनकर भाई लोग दी. मोहन सिंह अपना हिस्सा के बजदावा दे देस.

पंच परमेश्वर के बात केहू ना काटल. आरा में बड़ी मठिया के पास मकान खरीदाइल आ मोहन आरा जा के रहे लगलन.

एक दिन अखाड़ा पर एगो चेला बोललस, 'उस्ताद अइसन धोबियापाट मरलन कि ऊ साफ चीत हो गइलन.'

छेदी सिंह के मुस्की देखत बनत रहे.
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चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह 'आरोही'

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