अँजुरी में सुरुज - डॉ. हरेश्वर राय

थीर पानी में ढेला उछाले चलीं
कोना-सानी से जाला निकाले चलीं।

लिके - लीक कबहूँ सपूत ना चलस
राह सुन्दर बनाईं ऊँचा ले चलीं।

जदी अंगुरी अंगार से बचावे के बा
हाथ में मोट सिउँठा उठा ले चलीं।

अगर फूलहिं से पहिले चपाती फटे
मोट आटा के चलनी से चाले चलीं।

रात के मात देवे के बड़ुए अगर
अपना अँजुरी में सुरुज उठा ले चलीं।
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लेखक परिचय:-
नाम:- डॉ. हरेश्वर राय
प्रोफेसर (इंग्लिश) शासकीय पी.जी. महाविद्यालय सतना, मध्यप्रदेश
बी-37, सिटी होम्स कालोनी, जवाहरनगर सतना, म.प्र.,
मो नं: 9425887079
royhareshwarroy@gmail.com

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