साँच के सोर - डा. गोरख प्रसाद मस्ताना

माटी माटी खेल भइया सज्जी दुनिया माटी हऽ
अदमी के जिनगी बस बुझऽ घास फूस के टाटी हऽ।

राजमहल के बाटे जे उ अउरी बा हउआइल
घीव दूध में डूबकी लेके छनेछने अगराइल
बा जेकरा संतोख हिया में, ओकरा ला कूल छाँटी हऽ।

कहाँ रहल बा केकरो गुमान, जे तोहर रह पाई
माटी के ई दहिया एकदिन माटी में मिल जाई
जरि जाई धू-धू करि के जइसे पुअरा के आँटी हऽ।

अजगुत बा माटी के महिमा जनम मरण के साथी
दू मुठ्ठी मटिये ही होला आखिर बेर सँधाती
ना बूझल जे मरम ई जगए उनका ला काँटा काँटी हऽ।

साँच हवे कि पीयर पतई गछिया से झरि जाई
चिरई उड़ी जाईखोंता से केहू थाह ना पाई
तब लागी दुनिया कुछुओ ना एगो सूनी घाटी हऽ।

नापे में अझुराइल बाड़ऽ दउलत के उँचाई
साँस के डोरी टूटी जहिया साथ किछु ना जाई
बाबा कबीर के बतीया,गुन बऽ त लागी खाँटी हऽ।
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लेखक़ परिचय:-
नाम: डा. गोरख प्रसाद मस्ताना
जनम स्थान: बेतिया, बिहार
जनम दिन: 1 फरवरी 1954
शिक्षा: एम ए (त्रय), पी एच डी
किताब: जिनगी पहाड़ हो गईल (काव्य संग्रह), एकलव्य (खण्ड काव्य),
लगाव (लघुकथा संग्रह) औरी अंजुरी में अंजोर (गीत संग्रह)
संपर्क: काव्यांगन, पुरानी गुदरी महावीर चौक, बेतिया, बिहार

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