संपादकीय

पिय बड़ सुन्दर सखि - धरनीदास

पिय बड़ सुन्दर सखि
पिय बड़ सुन्दर सखि बनि गैला सहज सनेह ।। टेक।।

जे जे सुन्दरी देखन आवै, ताकर हरि ले ज्ञान।
तीन भुवन कै रूप तुलै नहिं, कैसे के करउँ बखान ।। 1।।

जे अगुवा अस कइल बरतुई, ताहि नेवछावरि जावँ।
जे ब्राह्मन अस लगन विचारल, तासु चरन लपटावँ ।। 2।।

चारिउ ओर जहाँ तहाँ चरचा, आन कै नावँ न लेइ।
ताहि सखी की बलि-बलि जैहों, जे मोरी साइति देइ ।। 3।।

झलमल झलमल झलकत देखो, रोम रोम मन मान।
धरनी हर्षित गुनगन गावै, जुग जुग है जनि आन ।। 4।।
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लेखक परिचय:-
नाम: धरनीदास
जनम: 1616 ई (विक्रमी संवत 1673)
निधन: 1674 ई (विक्रमी संवत 1731)
जनम अस्थान: माँझी गाँव, सारन (छपरा), बिहार
संत परमपरा क भोजपुरी क निरगुन कबी
परमुख रचना: प्रेम प्रकाश, शब्द प्रकाश, रत्नावली

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