संपादकीय

हम भारत के संविधान हईं - जलज कुमार अनुपम

हम भारत के संविधान हईं
दुनिया के सबसे सुनर वेवस्था के बखान हई
अधिकार के दाता हई
इति हास के भी ईगो गाथा हई
बहुते साहस और क्षमता बाटे हमरा में
पर आज हम खुदे लाचार हई
हम भारत के संविधान हईं।

आज सब केहु कहेला की
हम हिंदुस्तान के आन बाण शान हई
हमरा न बुझाला की हम केकर पहचान हई
जे देहलक हमरा के जनम वो हमर दू गो नाम रखलक
पता न काहे वोह वेरा उ अपना धरती के इतिहास के ओरि ना तकलक
हमरे देशवा में गणतंत्र पैदा भइल रहे
फिरू हम दूसरा जगह से थोपल नक़ल के भरमार हई
पर आज हम खुदे लाचार हई
हम भारत के संविधान हई
कुछ लोग कहेला की खाली हम खादी अउरी गुलाब के दें हई
न बाबू ना हम अनगिनत बलिदानन के ढेर हई
केतना पुस्त खप गईल हमरा के लेआवेमे
हम उन सब के प्रतीक्षा के परिणाम हई
हम भारत के संविधान हई
जानत बानी हमरा पता बा की अब हम्मी रउरा सब के जिए के आधार हई
पर अ ब हमहि घूंट घूंट के जियत बानी
एक गो हमरा देह में कई गो रउरा सबन देह करत बानी
बहुत दर्द होला हमरा जब कहे लगवला हमरा दामनवा पे दाग
दुश्मन के बात छोड़ी न जी हम त अपने लोगन से बर्बाद हई
हम भारत के संविधान हई
जनता आज मौन बाटे समता खत्म बाटे
हमर गलत अर्थ लगा के
स्वार्थ खातिर हमरा के तोड़ के मोड़ के
झखम अभी भी हरा बाटे हमरा पे
हम मन मौजी बिपक्ष ता कभी
आपातकाल अउरी अध्यादेश हई
हम भारत के संविधान हई
गर जरुरत महशुस होखे त
हमरा में कुछ जोड़ी
अपना स्वारथ खातिर मत हमके तोड़ी अउरी मरोड़ी
हम राउरे आत्मसम्मान अउरी स्वाभिमान हई
हम भारत के संविधान हईं।
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लेखक परिचय:-
नाम- जलज कुमार अनुपम
दिल्ली ई-मेल:- merichaupal@gmail.com

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