संपादकीय

हमार गांव - जलज कुमार अनुपम

हमार गांव
गंडक के तिरा पर बसल
दखिन ओरी दियरा मे धसल
भोर मे पनघट पर जमघट
फ़ुलवारी मे देखला पे श्याम – राधा के खटख़ट
जहवा पे धुपो मे मिलेला छांव
हमार गांव।

चारु ओर जह्वा पे फैलल हरियाली
गीत गावेले जहां पे कोयलिया काली काली
सांझी खानी जहवा पे लागे ला चौपाल
सबसे सुनर सबसे निमन
हमार गांव।

केहु के लइका केहु के नानी
रोज सुनावल जाला जहा कहानी
तिज त्योहार मिल के मने जहवा
का राजा का रानी
भाई – भाई मे जहव न लगावे केहु दांव
हमार गांव।

मिट्टी जहां के बचपन के जान ह्वे
मिसरी औरी गुण जहां पानी से साथ के पह्चान हवे
राम – रहीम के मेल जह्वा सबके अरमान हवे
आजुवो सभ्यता नइखे बनल जहां शमशान
हमार गांव।

नित्य गोबर से लिपाला जहां आंगन
चुना औरी गेर से जहां बनल बाटे मांडन
उ विरहा उ कजरी उ होली के गीत
उ झिझिया उ सांझा उ तुलसी से प्रीत
आज भी उ इ देशवा के जान ह
हमार राउर तोहार सबकर प्रान ह
हमार गांव।

जहवा के मेलवा मे हजार गो झमेला
कभी पापा साथे त कभी जायी अकेला
जहां सावन के इयाद हरिहरका चुड़ी दिलावेला
उ बंशी के तान दिलवा मे प्रित जगावेला
जहां ईद अउरी होली सब केहु मनावेला
नौकरी , परीक्षा , सफलता ला
प्रसादी सब केहु चढावेला
जहां दोसरा के दुख तक्लिफ़ खतिर
लोग दे देला आपन जान
हमार गांव।
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लेखक परिचय:-
नाम- जलज कुमार अनुपम
दिल्ली ई-मेल:- merichaupal@gmail.com



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