संपादकीय

बाज रहल बा - गुलरेज शहजाद

ढोल मंजीरा खानी जंगल
बाज रहल बा
आबादी के मौन में
भारी कोलाहल बा।

समय के माथ पs चिन्हासी
चिंता के लउके
घर के भीतर बाहर सगरो
राजनीति के हल्ला-गुल्ला।

धरम कबड्डी खेल बनल बा
हिन्दू-मुस्लिम के रट मारत
दउरस पंडित-ज्ञानी मुल्ला
केहू जतन करे कुछ नाहीं
सब केहू बनल पनसोखा
ओका बोका तीन तड़ोका।

मुचकाईं ईमान धरम के
हड्डी गुड्डी
आईं चलीं खेलल जाव
चेत कबड्डी चेत कबड्डी।
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लेखक परिचय:-
नाम - गुलरेज शहजाद
कवि एवं लेखक
चंपारण (बिहार)
E-mail:- gulrez300@gmail.com

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