गीतांजलि - रवीन्द्रनाथ टैगोर

विपदा से हमरा के

विपदा से हमरा के
हरदम बचाव ऽ हरि
ई ना बाटे मिनती हमार
जब जहाँ विपदा से
सामना जे होखे प्रभु
हम नाही होईं भयभीत
निडर बनाव हरि हमरा के अतना कि
गाई हम विपदो में गीत
दुखित व्यथित मन के
धीरज धरावे खातिर
चाही नाहीं संत्वना के भीख
दुःख पर विजय पाई
पीड़ा के पराजित करीं
अइसने द हमरा के सीख
मिले नाहीं कवनो मदत
केनहूँ से जदि
टूटे पावे बल ना हमार
मनवाँ में हीनता ना कबहूँ समाए पावे
बनीं नाहीं कबहूँ लाचार।
दुनिया मे चाहे हम कतनो घटी उठाई
चाहे हम ठगाई बार-बार
कतनो अनिष्ट होखे, तबहूँ न होखे पावे
दीन हीन मनवा हमार।
कष्ट-काँट में से हमें
आके तू बचा लऽ हरि
ई ना बाटे प्रार्थना हमार
हम चाहीं पवँरे के बल रहो हमरा में
संकट ऽ के सागर ऽ अपार
दुखवा के बोझवा के
हलुकऽ बना द हरि
ई ना माँगी तहरा से भीख
बोझवा के लेले हम डेगवा बढ़ावत रहीं
इहे दे द हमरा के सीख
सुखवा में सिरवा नवा के करीं सुमिरन
तहरा के करीं हम याद
दुखवा में दुनिया के लोग भागे धोखा देके
तबहूँ ना मन में बिखाद
तहरा पर राफ नाहीं होखे हरि कबहूँ
मन के सिखा द इहे रीत
सभे उपहास करे दुरदिन अइला पर
तूहीं हउवऽ दुरदिन के मीत।
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हरि हो, हम तरह तरह के वासना के पीछे

हरि हो,
हम तरह-तरह के वासना का पीछे
रात-दिन दउर रहल बानीं।
हम त जी-जान से, प्राणपन से,
खाली वासना के चाहना में बानीं।
तरह-तरह के वासना,
तरह-तरह के चहेठा।
तरह-तरह के लालसा,
तरह-तरह के लहेठा।
अनंत बा हमार वासना के आग।।

तबहूँ तूं हे हरि,
ओह सबसे हमरा के अलग करके
हमरा के बिल्कुल बँचा लेवे लऽ
तूं अपना कृपा के कठोर आँकुस से
वासना के आग से निकाल लेवे लऽ
हमरा के जरे से बँचा लेवेलऽ
वासना का भट्ठी में भसम होके का पहिलहीं
तूं हमरा के ओ में से खींच लेवेलऽ
धन्य हमार भाग्य,
कि तहरा बा कृपा करे के आदत
आ दया देखावे के बान!!
तहार ई कठोर कृपा,
(ओह घड़ी हमरा कठोरे बुझाला)

हमरा रोआँ-रोआँ में समाइल बा!
तहार एह कठोर कृपा से,
तहरा एह निठुराई से,
एह दया के बेदरदीपना से,
हमरा जीवन के कोना कोना अगराइल बा!!
तहार ई कठोर कृपा
हमरा रोआँ-रोआँ में समाइल बा!!
धन्य ह तहार कठोर कृपा,
धन्य तहार निष्ठुर दया,
जेसे हमार समूचा जीवन भरल बा!
समूचा जीवन भरल बा!!
ना चाहीं हमरा लोक, ना चाहीं परलोक!
का होई हमरा आकाश, आ का होई आलोक!!

नइखीं माँगत हम तहरा से-
तन-मन आ प्राण के भीख!
हमरा त बस अतने चाहीं हे हरि,, अतने चाहीं,
कि वासना के बान से, लालसा के लूह से,
अपना के बचा लेवे लायक हमरा में,
योग्यता दे द, शक्ति दे द!
इहे होई हे हरि,
हमरा खातिर तहार महादान!!
ठीक-ठीक जानीं ना
राह जवन जाला सीधे तहरा लगे;
तबो हे हरि, कबो-कबो,
तहरा के खोजत, कबो-कबो,
तहरा के खोजत-खोजत, भूलत-भटकत,

अनजाने में हम चल पड़िले ओही राहे,
जवन तहरे लगे जाला, हे हरि,
तहरे लगे जाला!!
बाकिर तूं
बल के बेदरदी, करके निठुराई,
सनमुख से सरक जालऽ
तनिए सा हट जालऽ!!
बाकिर हरि हो,
हम त बूझ गइलीं एकर मरम,
जान गइलीं एकर रहस्य,
अपना से मिलन खातिर
हमरा के योग्य बना रहल बाड़ऽ
हमरा में जे कमी बा, हमरा में जे खामी बा
ओके दूर करे खातिर
नाना नाच रहा रहल बाड़ऽ
विकट वासना से हमरा के बचाके,
लालसा के लूह-लपट से रक्षा क के,
हमरा के अपना से पूर्ण मिलन का योग्य
बना रहल बाड़ऽ!!

बूझ गईलीं तहरा कठोर कृपा के मरम,
समझ गईलीं तहरा निष्ठुर दया के रहस्य!!
बँचा ल, हे हरि, बँचा ल,
हमरा के वासना से बँचा ल!
हमरा के लालसा से बँचा ल!!
एकनी का भयंकर भट्ठी में
भसम होखे का पहिलहीं
बाँह हमर थाम्हल, जरे से बँचा ल!
बँचा ल हे हरि, बँचा ल!!
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कतना अनजानल-अनचिन्हार के

कतना अनजानल-अनचिन्हार के
तू जना देलऽ, तू चिन्हा देलऽ
कतना अपरिचित के
बना देलऽ तूं परिचित।
कतना बेजानल-सुनल घर में
तू ठौर ठिकाना दिया देलऽ
चिन्हाय सबकरो के
एगो सहारा लगा देल।
जे दूर रहे
ओके बना देलऽ नजदिकाह
जे पराया रहे
ओके बना देलऽ आपन भाय।
भारी चिंता होला
कि मुउला पर का होई?
पुरान डेरा छोड़ के
उहाँ गइला पर का होई?
बे जानल घर में,
के होई आपन?
के होई सहारा?
अपरिचित जगही
के होई चिन्हार
के होई सहारा!!
भोर पड़ जाला हे प्रभु
भोर पड़ जाला
कि ओह नयो जगही
एगो तूं त आपन रहबे करबऽ
जियला पर भा मुअला पर

एह लोक में भा परलोक में
जब जहाँ तू ले जइबऽ
तब तहाँ हम जाएब।
निखित भुवन में भटकब
बाकिर,
जनम जनमांतर के जानल
चिर परिचित सनातन साथी
तूं त हर हमेसा
हर जगही
संगे रहबे करब
तूं ही सब के चिन्हइब
सभ के आपन बनइब
तूं त हर हमेसा के
हमार चिर परिचित हउवऽ
नयो जगही पुराने लेखा भेटइब
नयो में पुरान
नूतन में पुरातन!!
तूं त हमार सनातन साथी हउव
हर हमेशा के आपन
जे दूर रहे
ओ के बना देलऽ नजदिकाह
जे पराया रहे
ओ के बना देलऽ आपन
जे तहरा से परिचित बा
से केकरा से अपरिचित बा?
जेकर तू आपन बारऽ
सेकर के पराया बा?
कहाँ गईल मना ओकर
कहाँ आइल मना बा
काथी के बा डर कहाँ
भय के निशाना बा।
ओकरा के रखे खातिर
तू रखवाला प्रभु
ओकरे सुरक्षा खातिर
तू मतवाला प्रभु
जागेलऽ हमेसा होके
ओकर तूं पहरूआ
तहरा के चीन्हे से ही
तोहर ह दुलरूआ
सउँसे सृष्टि के
भक्ति एकत्र क के
तूं ओकरा खातिर जागेलऽ
जे तहरा के बना लेला आपन
जे रहे दूर
ओकरा के बनादेलऽ नजदिकाह
जे रहे पराया
ओकरा के बना देलऽ आपन!!
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सभका भीतर में निवास बा तहार

सभका भीतर में निवास बा तहार
सभका अंतर में आवास बा तहार
सभका अंतर के रहवइया
हे अंतरतर,
हमरा अंतर के विकसित कर द
हमरा भावभूमि के हरिअरा द
हमरा भीतर के निर्मल बना द
हमरा भीतर के उज्जवल बना द
हमरा भीतर के सुंदर बना द
हमरा भीतर के जगा द
हमरा भीतर के तैयार करा द
हमरा भीतर के निडर बना द
हमरा भीतर के मंगल कामना से भर द
हमरा भीतर से आलस हटा द
हमरा भीतर से संदेह हटा द
हमरा अंतर के विकसित कर द
हमरा भावभूमि के हरिअरा द
हमरा हृदय के सभका से जोड़ द
बंधन मुक्त बना द हमरा के
अखिल विश्व से हमरा अपनापन हो जाय
एह राह के हर रोड़ा चकनाचूर हो जाय
हृदय के हर गाँठ खोल द
हर बंधन तूर द
मुक्त बना द हमरा के
हमरा हर काम में तहार छंद छलके लागे
तहार गीत बोले लागे
भर द आपन हुलास भरल गीत, हमरा हर काम में
तहरा चरन कमल में, हमार चंचल चित्त
थिर हो जाय।
अइसन लगन लागे
जे छोड़वलो से ना छूटे।।
मगन बना द, मस्त बना द
कर द आनंदित
आनंदित, आनंदित।।
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आवऽ हे प्रियतम, आवऽ

आव ऽ हे प्रियतम आवऽ
तू नया-नया रूप से
रोज हमरा प्राणन में आवऽ
तू हमरा गंध में आवऽ
तू हमरा रंग में आवऽ
तू हमरा गीत-गान में आवऽ
तू हमरा अंग-अंग में
पुलकित करे वाला
छुअन बन के आवऽ
आवऽ तूं हमरा निर्मल-उज्जवल शरीर में
अपना सुंदर स्निग्ध प्रशांत रूप में
आवऽ आवऽ हो विचित्र परिधान में।
आवऽ हमार मर्म के
सुख, दुख में आव
आवऽ हमार नित्य प्रतिदिन के
सब करम में
जब हमार सब करम अवसान होई
तब तू नया नया रूप से
आवऽ हमरा प्राणन में।
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आज धनखेती में

आज धनखेती में
धूप छाहीं के
लूका चोरी खेल चल रहल बा।
नील आसमान में
ऊजर मेघ के नाव
के भसा देले बा
आज भौंरा
भुला गइल बा
मधु पीअल
मताल लेखा
उड़ रह बा
तहरा प्रकाश-किरण में।
आज नदी किनारे
चकवा-चकई
काहे खातिर आइल बा?
काहे खातिर चराउर कर रहल बा?
अरे भाई रे भाई
आज ना जाएब हम घरे
ना जाएब हम घरे।
आज हम,
आकाश में छेद क के
छितराइल वैभव के
लूट करेब, लूट लेब।
आज समुंदर के
ज्वार-जल में

फेन-पर-फेन बना के
हवा ठठा के हँस रहल बा।
आज बिना काम-काज के
बे-बात के बात,
बंसी बजावत
सउँसे दिन काट लेब।
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