संपादकीय

खदेरन के पाठशाला (चीरहरण) - - लव कान्त सिंह

(सब लड़िका क्लास के एगो कोना में बिटोराइल बा, दुगो बेंच गिरल बा चिरकुटवा ओहिमें दबाके माई-माई चिचियाता, लबेदा सुथनी एकदोसरा के झोंटा नवा के लड़ता आ गरियावता, खदेरन छोड़ावे के परयास करत बारें, मास्टर साहेब के प्रवेश होता। सब हबड़-हबड़ अपना बेंच पर भागत बारन स)

मास्टर साहेब- झाडूल गाँधी सुधर जाएगा बाकी तुम लोग नहीं न सुधरोगे, ई बेंच सब उठाओ, दुनु झोंटा झोंटी काहे कर रहा था जी?
लबेदा- मारसायेब हई एथिया के नाती हमार टिफिन बिना पुछले उठा लेलस हs आ मंगनी ह त गारी बकता।
मास्टर साहेब- कउवा कम्हार जईसा करता है तुम सब, काहे रे सुथनी काहे टिफिन छीन रहा था इसका।
सुथनी- एकदिनवा ई हमार टिफिन चोरा के खा गइल रहे की ना!!
मास्टर साहेब- लाओ इधर दो हमको कौनो नहीं खायेगा, हम खायेंगे इहे दंड रहेगा तुम सबको(टिफिन खोलके) अरे बाह एमे त खीर है।
ढ़ोंढ़ा- ओहिसे नु एकनी मार कईले रहे।
मास्टर साहेब- खदेरन तुम खाड़ा होखो आ टास में दिए थे कहानी लिखने को, सुनाओ, तब तक हम खीर खाते हैं आ तुम दोनों कान ध के बेंच प खाड़ा हो जाओ, कुछो बोले त मार सटका के बिधुनिए देंगे।
खदेरन- माट साहेब कहानी बा की देव चचा के दादा के ग्राउंड में एक बेर फेर भोजपुरिया महाभारत के चीरहरण शुरू भइल। ओने से कौरव आ एने से पांडव। भोजपुरी के सभा में बोलावल गइल। कौरव के तरफ से गिन्दु रोनाली, हवन सिंह, बिमा सिंह, किनारा गुप्ता इत्यादि लोग ठहाका मार के हंसत बा लो जुरजोधन जी हस्तिनापुर जीते के फेरा में सब नीमन-बेजायें लोग के बिटोर लेले बारन। भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आ विदुर मुड़ी लटका के बईठल बा लोग।
मास्टर साहेब- बाह खीरवे खानी तुम्हारा कहानी भी स्वादिष्ट है, हं त फेर का हुआ?
खदेरन- फेर दारु के नीशा में धूत हवन सिंह दुस्सासन बनके भोजपुरी के चीरहरण शुरू क देलन, पांडव लोग खिसिया गइल, भरत जी भीम लेखा खिसिया के मंच प से उतर गईले बाकी चीरहरण चालू बा, जनता थपरी पीट रहल बा। लोहा सिंह 12 बजे से तइयार रहस आ रात के 8 बजे ले चहले की अब मोका मिली त कृष्ण बन के भोजपुरी के बचावे के कोशिश करेम, बाकी गिन्दु रोनाली लोहा सिंह प भारी पड़ गईली, बाकी कसर नेता लोग पूरा क देहल। लोहा सिंह भोजपुरी के चीरहरण से आहात होके चल गईलें। जुरजोधन के खुसी के ठेकाना ना रहे की अब त हस्तिनापुर हमरे ह। बीर कुंवर सिंह भी बहुत कोशिश कईलें, बहुत तीन-पांच कईला के बाद बिहान भईला उनका भोजपुरी के साड़ी पहिनावे के मोका मिलल बाकी जब पूरा सभा में दुस्सासन के कमी ना रहे त ई कतना देर टिकी!! भरल सभा में भोजपुरी के खूब बेजतीयांव भइल।
लबेदा- ऐ खदेरन भाई, धृतराष्ट्र ना कुछो कहलक?
खदेरन- धृतराष्ट्र के संख्या हजार से बेसिए रहे बाकी ऊ त धृतराष्ट्र बा बोली काहे।
मास्टर साहेब- बाह बहुत बन्हिया है आनंद आ गया।
खदेरन- धन्यवाद मारसायेब।
मास्टर साहेब- का धन्यवाद, हम त खीर के बात कर रहे थे बहुते स्वादिष्ट है। बेटा लबेदा तुम बईठ जाओ काल्हे भी अपना माई से कहना की अइसने खीर बना के भेजे।
लबेदा- खोरहवा कुतवा के मरले बानी हाड़ाह, अब उ काहेके फेर कबो खीर में मुंह नावे जाव। ई त हम ले आइल रनी ह कुकरा के देवे ना लउकल ह त टिफिन लेले आ गईनी ह जात में मिली त खिया देतीं।
मास्टर साहेब- बेहुद्दा कहीं का, मुर्गा बन जाओ अबकी, ना त मार सोटा के चाम छिल देंगे...आक थू...थू..ओए।
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लव कान्त सिंह
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
अंक - 114 (10 जनवरी 2017)

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