सोच - ओशिन शिशिर "रफेल"

वाह री गुलजारो ! तोहार बेटा डागदर का बन गइल, तु त चांदी काटे लगलू । आउर सहर तोहार भेस-भूसा ,पहनावा बदल देहले बा। बाकि नइखे बदलल त तोहार इ अजीबे नाम " गुलजारो देवी"। इ कहिके नर्मदा आपन बचपन के सखि के गले से लगा के जोर जोर से हँसे लगलीं ।
गुलजारो देवी उनुके बात पे गते से मुसुकिअइनी । ए हो नर्मदा एगो खुसखबरी सुना , हमरा एगो करेजवा नीयन पोती भइल बिया । ए खुसी में ला लड्डू से मुँह मीठा करS । गुलजारो देवी के इ बात सुनके नर्मदा मुँह बिजुका लिहलीं । रवि के बिटिया भइल बा , इ सुनके मन माहुर हो गइल। नर्मदा गुलजारो देवी के लगलीं दिलासा देवे । उनुके एह बात पर गुलजारो देवी पुछलीं - एहमे दुखी होखे के कवन बात हवे नर्मदा ? नर्मदा कहे लगलीं तोहार पतोह बेटी के जन्म देहले बिया, बेटी के। बेचारा रवि बेटा कहाँ से लिआई दहेज, ओके बियाह से पहिले ओकरे इज्जत के खियाल राखी । कब का अनहोनी हो जाई के जानSता। बेचारी बिटियन के कवनो गलती न रहला के बादो लइका लोग तेजाब फेकिए देवेला , अरे बियाह के बाद लइकी भलहीं बांझ रहो , भा जदि बेटी भ गइल त सास- ननद अउरी आस पड़ोस के ताना अलगा से । बाप रे बाप गुलजारो एहसे बढिया दई बेटिए ना दे। गुलजारो अब तू हमरे "भूवन" के देखs ,चार लइका के बाप । कुछो ढंग के काम न कर पाइहें स तबो मोट दहेज अइबे करी । ओहनी के जिनगी नीमन से कटी । नर्मदा आपन विचार रखलीं।
नर्मदा तू सही कहत रहलू ह ,हम सही में बदल गइल बानी । आउर इ बदलाव खाली हमरे पहिरावा में नइखे बलुक हमरे सोचिओ में आ गइल बा । पाहिल बात त इ बा कि हमरा गरब बा कि हमार पतोह हमरा तोहरा जइसन एगो बेटी के जनम दिहले बाड़ी , जे बड़ होके भाई के कलाई पे राखी बान्हे वाली बहिन , बाप- महतारी के पूरा जिनगी आ उनकर मरे के बादो इज्जत देवे वाली बेटी, कवनो माई के लाल के मुसकान, कवनो बेटी - बेटा के माई बनी।
नर्मदा , जानत बाडू, हमनी के अपने घर के लइका सन के समझावल जाव कि कुल्हे लइकिन के सनमान करे के चाहीं, अइसन संसकार देवेके चाही कि कवनो लइकी से छेड़खानी, बलात्कार, तेजाब फेके नियन पाप अपना जेहन में लिववलो पाप बा ,काहे के काल्हु हमनी के बहिन, बेटी, पत्नि एकरे चपेट में आ सकेलिन। तब कइसन तकलीफ से परिवार गुजरी । बेटा के एह लायक बनावे के चाहीं कि उ दहेज ला सोचबो ना करे आउर दहेज के विरोध में आवाजो बुलंद करे । हर घर के मेहरारू दहेज के विरोध में ठाढ़ हो जइहन स त साँचो कहतनी नर्मदा विधवा अउरी सती प्रथा जइसन इ दहेजो प्रथा पर रोक लाग जाई । अगर बच्चा खुद के ना होखी आउर लोग ओकर अपमान करी त बतावा कइसन लागी ? अइसन बुद्दी विचार सास अउरी आस -पड़ोस के मेहरारू लोगिन में आ जाई त कवनो मेहरारू बांझपन के पीडा के ताना से ना नु गुजरी | आउर नर्मदा , बेटी - बेटा त भगवान के नेग बा लो । आउर बेटी ना होखी त उ आगे चलके बेटा जात के जनम कइसे देही ? इ तु काहे नइखे सोचत ?
हम त सोच लेले बानी के हमार पोती जेतना चाही ओतना पढ़ायेम जवना से उ आपन पैर पर खुदे ठाढ़ हो आउर आगा जाव । इ दादी आजुवे परण लेत बिया ।
अउरी हा नर्मदा हमार नांव गुलजारो देवी हमार माई - बाबूजी बड़ा परेम से रखले रहलन। माई - बाबू के दिहल अस्तित्व क पहचान आउर नाँव के कवनो बेटी ना बदल सके। काल्ह के पोती होखे के खुसी में दावत रखले बानी, पूरा परिवार के संगे अइहा । मेहरारू होके मेहरारू के दरद ना समझेम, ओकर सनमान ना करेम त कइसन मेहरारू आउर कइसन इंसान ? हम त आपन पुरान सोच के बदल के आगे बढ़ गइनी, अब तु सोच। इ कहत गलजारो देवी नर्मदा के सोचे पे मजबूर कइ के नास्ता-पानी लियावे खाति घर के भीतर चल दिहली।
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ओशिन शिशिर "रफेल"
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
अंक - 100 (04 अक्टूबर 2016) 

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