संपादकीय

होरी आइल बा - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

देश जरत बा धू धू कईके 
सद्बुद्धि हेराइल बा॥ 
कइसे कहीं कि होरी आइल बा॥ 

चंद फितरती लोग बिगाड़ें 
मनई इनकर नियत न ताड़ें 
मगज मराइल ए बेरा में 
भा कवनों बिपत समाइल बा॥ 
कइसे कहीं कि होरी आइल बा॥ 

बुढ़ पुरनियाँ लईका औरत 
आग लगावत सगरों दउरत 
सरकारी गेहूं के संगे 
घुनवो आज पिसाइल बा॥ 
कइसे कहीं कि होरी आइल बा॥ 

टूटल जाता गाँव के मड़ई 
सुखल जाता प्रेम के गडही 
मारे डर के दुबकल घरहीं 
पानी बिना झुराइल बा॥ 
कइसे कहीं कि होरी आइल बा॥ 

नवटंकी बहुते बा भारी 
रौंदाइल बा स्नेहिल क्यारी 
नोट वोट के जोड़ तोड़ में 
भर देशवा अइठाइल बा॥ 
कइसे कहीं कि होरी आइल बा॥
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अंक - 72 (22 मार्च 2016)

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