संपादकीय

धोखा - केशव मोहन पाण्डेय

बदलल जमाना
बदलल ओझा सोखा।
मुँह में बाड़े राम
बगल से मिले धोखा॥

असरा के बदरा उड़ल बन के भुआ
पता लागल तब कि जिनगीया ह धुँआ
धधाले धीअरी त
मन करे रोका।
मुँह में बाड़े राम
बगल से मिले धोखा॥

लइकन के मीत-गीत सगरो भुलाइल
नुन तेल लकड़ी के चिंता जो आइल
बुद्धिआगर मनई
बनि जाला बोका।
मुँह में बाड़े राम
बगल से मिले धोखा॥

मँगनी के सतुआ में खाँची भर पानी
केतना बा पानी पुछेली घोघा रानी
अँचरा के ओता में
माजरा अनोखा।
मुँह में बाड़े राम
बगल से मिले धोखा॥

छोड़ावे ला मइल मन झाँवा से मलनी
सूपा के देख देख हँसे लागल चलनी
एके गो घरवा में
छिहत्तर गो मोका।
मुँह में बाड़े राम
बगल से मिले धोखा॥
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अंक - 82 (31 मई 2016)

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