संपादकीय

गमछा पाड़े - 1 - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

आज हम रउरा लोगिन के परिचय गमछा पाड़े से करावे चाह रहल बानी. छपरा सिवान के खून अउरी बनारसी माटी के सोन सुगंध लिहले एक अईसन चरित्र जेकर वर्णन कईऽल ओतने मुश्किल जेतना कि हथेली पर दही जमावल आ समझला पर ओतने आसान जेतना कि तेज छुरी से माखन काटल. तऽ उनकरा बारे में सुने से अच्छा बा कि रउआ लोगिन धीरे धीरे पढ़ीं जा अउरी समझे के कोशिश करीं जा. लोगन के बीच में गमछा पाड़े के नाम से मशहूर आ ओही नाम से बोलावल पसंद करेले. सनीमा अउरी जासूसी सीरियल देखत देखत खुद के जासूस माने लगले आ एगो नेताजी के शरण में जाके प्राईवेट जासूसी करे के लाईसेंस जुगाड़ लिहले. सीरियल के भूत सवार रहे से बिना सेक्रेटरी के आफिस खोले के कल्पना भी ना कर सकत रहुवन बाकि मन माफिक लेडी सेक्रटरी ना मिलल तऽ मोहल्ला में गोबर पाथे वाला ठलुआ के आपन सेक्रेटरी अउर चपरासी दुनू बना लिहले. जुगाड़ करके घरवे में आफिस भी खोल लिहले बाकि आफिस खोले के चक्कर में मेहरारु से अनबन भी खूब भईऽल. बाकि घर में आफिस तबे खुलल जब पाड़ेजी, मालकिन से वादा कईऽले कि ठलुआ पहिले घर के काम करी फिर आफिस के.
अउरी ए तरह से गमछा पाड़े के आफिस के शुरुआत हो गईऽल. ठलुआ दिन भर घर के काम में बिजी रहे लागल आ पंडितजी कस्टमर खोजे मे. बाकि पंडितजी के जूता, चप्पल, गदहा आ कुकुर खोजे से बड़ काम ना मिलल आ उहो टेस्टिंग खातिर फ्री में करे के पड़ल. कमीशन आ दू जून खाना पर काम करे खातिर तैयार भईऽल ठलुआ के मुफत मे घर के काम कईऽल अखरे लागल. गोबर गनेश रहे बाकि एतनो ना कि मुफत मे काम करे लागे. बाकि पंडितजी ओकरा के केहु ना केहु तरे हर बार मना ही लेत रहन कि अब सब ठीक हो जाईऽ. भोले बाबा के पुजारी गमछा पाड़े के दिन भी आखिर आ ही गईऽल आ बिलाईऽ के भागे छींका टूटे वाला कहावत सही हो गईल. बात ई भईऽल कि मोहल्ला के एगो बड़ आदमी के मौत हो गईऽल आ पुलिस मामला हल ना कर पावत रहे बाकि पंडित जी अपना सिनेमाईऽ बुद्धि से मामिला के ५ दिन में हल कर दिहलन जबकि पुलिस खातिर ईऽ मौत एगो पहेली बुझउऽवल बन के रह गईऽल रहुवे.
का रहे रहस्मय मौत के साच आ पंडितजी कइऽसे कातिल तक पहुँचले इऽ किस्सा सिलसिलेवार बतावल जाईऽ हर मंगलवार से छोटा छोटा टुकड़ा में. जईऽसे जईऽसे गमछा पाड़े शहर में पापुलर होत जईहें वइऽसे वइऽसे रउऽआ लोगिन भी उनकरा से परिचित होत जाईऽब बाकि ई काम तबहीं हो सकेला जब कम से कम एक प्रतिक्रया हमरा के साईऽट पर जरुर मिले ताकि हमरा के ई लागे कि केहु बा जे गमछा पाड़े के बारे में जाने चाहत बा.
पंडितजी आफिस में बइठल‍-बइठल अखबार पढ़त रहुवन कि बाजार गईऽल ठलुआ बहरे से खुसखबरी बा, खुसखबरी बा, चिल्लात आफिस में ढ़ुकल. ओकरा हाथ में सब्जी के झोला सब्जी से भरल रहुवे. पंडितजी कुछ जान पइऽते एकरा पहिलही पंडिताइन अईऽली आ ठलुआ के कान पकड़ के भीतर घरि में ईऽ कहत ले गईऽली कि पहिले चल के सब्जी के हिसाब दऽ, आटा गूँथ द, फेर आके खुशखबरी बतावऽ. बेचारे गमछा पाड़े मन मनोस के रह गईऽले आऽ ओह घड़ी के कोसे लगले जब आफिस खोले खातिर पंडिताइन के शरत पर मोहर लगवले रहुवन. पंडितजी अखबार पढ़ल भूला के अफनात भईऽल आफिस के कमरा में एने-ओने टहले लगले. ठलुआ के आवे में पूरा एक घंटा लाग गईऽल आ जईऽसे ऊऽ आफिस में दाखिल भईऽल पाड़े जी दरवाजा बन्द कर लिहले अउरी ठलुआ के पकड़ लिहले कि कहीं पंडिताइन आ के फेर से ओकरा के ले मत जास. आखिर ठलुआ के खुशखबरी के बात बहरी आ ही गईऽल बाकि खुशखबरी सुन के पाड़ेजी ठलुआ के अईऽसे छोड़ले जइऽसे नारियल के झाड़ पर से नारियल गिरवले होखन.

"का भईऽल??", कहत जमीनी पर गिरल ठलुआ खाड़ होखत पुछलस तऽ पाड़ेजी दरवाजा खोले के बाद पलट के कहले,
"ससुर के, महादेव के कातिल के जे खोजी ओकरा के ५ लाख रुपया मिली, एकरा में हमरा कवन फायदा कि बहरिये से नरियात भईऽल अईलऽ हऽ."
"कातिल के रउऽआ पकड़ेब तऽ ईनाम का बहरी वाला के मिली? मगर रउऽआ में कुकुर-बिलार आ जूता-गदहा से आगे बढ़े के सहूर होखे तब नऽ." कहत पंडिताईन अन्दर अईऽली आ ठलुआ के फेर से रसोईऽ में चले खातिर ताना मारे लगली.
"बिना बोलवले कहीं जाये में हमरा बेईज्जती महसूस होखेलाऽ." ई कहला के बाद पाड़े जी के चेहरा के आभा देखत बनत रहुवे जेकरा के उऽतारत पंडिताईन के जरको देर ना लागल.
"उऽ बेईऽज्जती भी ५ लाख के होखी बाकि रऊऽआ त कुकुर-बिलार में अझुराईऽल रहीं आ बदला में कबो चाह, चाहे पान से संतोष करत रहीं..... (ठलुआ के बहरी अलंग ढ़केलत)..ईहाऽ का खाड़ बाड़ऽ चुल्हा में चलके रोटी बेलऽ ना तऽ आज खानो ना मिली."
ई कहत पंडिताईन ठलुआ के बहरी ले जाये में तनको देर ना कईऽली. पाड़ेजी गंभीरता से सोचे लगले आ टेबल पर से पान उठा के खईऽला के बाद बुदबुदाये बिना ना रहले.
"पंडिताईनो कबो कबो समझदारी के बात करिये देली... घबरा मत महादेव बाबू, अब तोहार कातिल जल्दिये हमरा कब्जा में होखी..."
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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"











अंक - 77 (26 अप्रैल 2016)

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