संपादकीय

चहका

सेजिया सईंया मोर, सेजिया सईंया मोर, 

आवत में डर लागे। 


घनन-घनन करे घुघुर,
पायल करे शोर, पायल करे शोर,
एक त रात अजोरिया, चितवे चहुं ओर, चितवे चहुं ओर
आवत के डर लागे। 

सासू हमारे दारुन, ननदी बिरही बोल, ननदी बिरही बोल,
गोतिन और पड़ोसिन, रोज-रोज करे खोज, रोज-रोज करे खोज,
आवत के डर लागे। 

सासू जे सुते ओसरवा, ननदो दहलीज, ननदो दहलीज,
सैंया सुते सेज ऊपर, जहां कानों ना कीच, जहां कानों ना कीच,
सासू के आवे अतरिया, ननदो के बुखार, ननदो के बुखार,
सईंया के होला रतौंनी, दिन सूझे ना रात, दिन सूझे ना रात,
आवत के डर लागे।

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 - अज्ञात
अंक - 74 (05 अप्रैल 2016)

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