संपादकीय

कहु का ना छुटी बा - दरसन दास

कहु का ना छुटी बा भजे के हरि नमवा।।
धधा तोरा धावल फिरे चढ़े गरदनवा
माया के बिसरेला भइल बा हैरनवा।।


साधु देखी पीठ देके भागेले चुहानवाँ
माया के मुँह देखी भइल बा मगनवा।।

छाती तोहर कड़खी जेह दिन आई बलवनवा
परचे-परचे लूट ली, मिली ना ठिकनवाँ।।

छाड़ रे माया मोह लागे ना बिगनवाँ
कहे दरसन पद भजन निरबनवाँ।।
-----------दरसन दास


अंक - 42 (25 अगस्त 2015)

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