संपादकीय

मातृभासा और राष्ट्रभासा - मनोरंजन प्रसाद सिंह

जय भारत जय भारती, जय हिन्दी, जय हिंद
जय हमार भाषा बिमल, जय गुरू, जय गोविन्द।
ई हमार ह आपन बोली। सुनि केहू जन करे ठिठोली।।


जे जे भाव हृदय का भावे। ऊहे उतरि कलम पर आवे।
कबो संस्कृत, कबहूँ हिन्दी भोजपुरी माथा के बिंदी।।

भोजपुरी हमार ह भासा। जइसे हो जीवन के स्वांसा।।
जब हम ए दुनिया में अइलीं। जब हम ई मानुस तनु पइलीं।।

तब से जमल रहल जे टोली। से बोले भोजपुरिया बोली।।
हमहूँ ओही में तोतरइलीं। रोअली हसलीं बात बनइलीं।।

खेले लगली घघुआमाना। उपजल धाना, पवलीं खाना।।
चंदा मामा आरे अइलें। चंदा मामा पारे गइलें।।
ले ले अइलें सोन कटोरी। दूध भात ओकरा में घोरी।।
बबुआ के मुँह में घुटुक, गइल दुध ओ भात।
ओकरा पहिले कान में, पड़ल मधुर मृदु बात।।
पढुआ लिखुआ करिहें माफ। हम त बात कहीले साफ।।
हमरा ना केहू से बैर। ना खींचब केहू के पैर।।
हम तब सबके करब भलाई। जेतना हमरा से बन पाई।।

हिन्दी ह भारत के भासा। ऊहे एक राष्ट्र के आसा।।
हम ओकरो भंडार बढ़ाइब। ओह में बोलब आ गाइब।।
तबो ना छोडब आपन बोली। चाहे केहू मारे गोली।।

जे मगही तिरहुतिआ भाई। उनहु से हम कहब बुझाई।।
ऊहो बोलसु आपन बोली। भरे निरंतर उनकर झोली।।

------------------------मनोरंजन प्रसाद सिंह
अंक - 36 (14 जुलाई 2015)
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