संपादकीय

करुआसन - अभिषेक यादव

अभिषेक यादव जी के ई पहिली कहानी हऽ औरी उनकर उमिर बहुत कम बे। ओ हिसाब से देखल जाओ तऽ एगो बहुत नीमन परियास कइले बाड़े। इनकरी लिखाई के सभसे नीमन बात ई बा कि अपनी कहानी में कहाउतन खुब परियोग कइले बाड़े। बहुत कुछ ना कहि के रउआँ खुद पढ़ि औरी राय दीं।

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'जियालाल! '




'यस सर '

'हीरालाल! '

'यस सर'

'भैयालाल!'

'यस सर'

'खदेङन? '

'खदेङन? '

'आईल बा कि ना हो?'

सगरी लईका एक सङगे बोललन सऽ, 

'जी गुरुजी आवत होई!' 

अगिला दिन फेरु हम हाजिरी लगावे लगनी


'जियालाल!..........'

'खदेङन!'

'खदेङन!'

'आईल बा कि ना हो?'

'जी गुरुजी आवत होई!' 

"ऐकर का मतलब? आज ओकरा 'अकल के कोल्हू' धईल छोङाएब; आवेदऽसन।' घिचपिचात आपन रजिस्टर पलट के कहनी।
कुछ घरि बाद 'खदेङन' एगो ७ बरिस के सुघर लईका, जवना के पाकिट आधा झूलत, नंगा पाँव, कपोर्छिल, हाथ में रबर आ नाक में ट्रैफ़िक जाम......।
''कारे! खदेङना तु रोज-रोज काहै लेटियातरे? तोरा 'छछुंदर छुवले बा' कि 'अनबोलता काना' भईल बाङे.........।" अनाप-शनाप बकला के बाद जब कुछ ना बोलल तऽ हम महट्यवलि कि - 'आछा चलऽ जाऐ दऽ जाके पाछे बईठ जा!' 
जब दूपहर भईल लईका लो खिचड़ी सरपेट के खेलत रहे लो, तऽ हम 'जियालाल' से पूछनी कि- 
'कारे! जिऊवा ई खदेङना गूँग हऽ का रे?' 
'जी गुरुजी ऊ तऽ 'करुआसन' हऽ!' 
धराक से ऐतना कहला के बाद ऊ आपन सरकत पेंट धईले खेले लागल। हम सोचनि जिऊवा 'आगे के जामल' हऽ का? अबही बीसो दिन ना पूजल 'मोदी जी' पद्मासन, बलासन, बकासन, इहाँ तक कि मलासन, भी कइनि हऽ ई 'करूआसन' का होला रे? मन ही मन कुछ देर 'ओझाई कईला' के बाद जब हमरा 'सूखल पातो ना भेंटाइल' तऽ मन मार के घरे अइनि.....। 
ऐतना घोचाह साहित्य तऽ हमरा मालूम ना बाकिर अपना 'भूसा-भंडार' से जेतना खाँचि उलेहे के रहे ओतना जरूर उलहनि। बड़ी देर ले 'आन्हार कोठी, गोटी बीटोरला' के बाद जब ओंघाई चपलस तऽ फोफियात सुत गइनि। 
जब सुबेर भईल तऽ हमरा ई सोची-सोच के पाद आवे कि दरियें बुढ़िया आजी जवन कि 'भोजपुरी में भार्गव डिक्शनरी' से कम नईखि, ईहाँ से १ बार पूछति तऽ कुल्ह समस्या हल-भल हो जात। हमार आजी थोड़ कटकटाह बाकिर दिल कऽ साफ रहली|।
'ऐ आजी! ई करूआसन का होला हो?' हम डेरात-डेरात पुंछन। 
"मार कमासूत के! ऐकरा करूआसन के मतलबै नईखे मालूम जाके 'अकलेशवा' से पूछ जेना १० लाख रुपईया फोकट कऽ देले बारे महटराई करे खातिर नऽ। हम तऽ पहिलही 'कन्हैयवा' से कहनि तोर बेटऊवा 'आग लगावन बा' महटराई छोड़ि पुलिस-पियादा के नोकरी कराव तऽ उहो पेन्हा....।" 
'बस! बस! बस! आजी बस! ना तऽ हमार कुल्ही पोल-चिट्ठा खोल देबू का?' 
कुछ घरि मनौती कईला के बाद फेर से पुछिए लिहनी- 
'ऐ आजी! तू तऽ जनते न बाङू हम 'देह कऽ सिंकुवार आ बुद्धि के मोट' हई।' 
आजी थोर घरि मयार भईलि आ कहे लगली कि- "करूआसन मने विनाशी, अपशकुन, जेके देखला, सुनला, संगे रहला, पऽ ऊँच-नीच, जबुन होखे ओकरा करूआसन कहल जाला..॥ ज।इसे- अगर सुबेर-२ करूआसन ब्येकत लउक जाव तऽ पूरा दिन हङासी लेखा बीतेला। ऊ लो हर काम में असुभ होलन।" 
'ओकरा के ज्योतिषी काहैं ना कहल जाला? जेकरा देखला से पता चले कि आजु कुछ अपशकुन होए वाला बा?', हम घचाक से पूछनी। 
'काहैं चील्लर के चह तूरऽ तारे? ऐकरा आगे हमरा कुछू नईखे मालूम हुंऽऽऽ...।' 
हम फेर में पङ गईनि कि 'हे प्रभु! ओह लईका के साथे का कुछ अपशकुन भईल? जे अभी काँचे उमिर में ऐतना जहर घोंटे के परऽता'। 





'कोल्हू के बैल' लेखा समय टेक आफ कइलस आ हम सीधे प्राइमरी स्कूल में लैंड कइनि। रोज के जइसन दैनिक-कार्यक्रम फेर जब दूपहर भईल तऽ हम 'हीरालाल' के बोलवनी। 
'कारे! तेतरहवा एह खेदरूवा के बारे में का जानऽतारे?' 
हीरा तेतरा के बोलस- 'दी गुलू दी! पापा तहेले ति- ओकला माई मुवल लहे दब ऊ पैदा भईल आ तुथ दिन के बाद फेलू ओकल बाबू मू दइले। ऐही थे ओकल ताता ओखे पंताइत भवन में तुभागी काकी के बेच दीहले।' 
'पंताईत मने पंचायत भवन?' 
'दी गुलू दी!' 
मन मसोस के रह गईल। जब पता चलल कि पंचायत भवन केवल कोस भर के दूरी पऽ बा, जहाँ के धुर ऐतना पावन बा। साँझ के बेरा 'अगुताइल आ संकुचाइल' मने ऊहाँ पहुँचनि साफ-सुथरा आ एगो गझिन 'नीम के गाँछ' आ ओकरा दहिने तरफ तुलसी कऽ चबूतरा कुल मिलाके 'जग खानी घर' रहे.....। अभी हम नियरयनि ना तबले कुछ दूरे से एगो आवाज आइल- 
'आवऽ बेटा! तू खदेङन के महटर साब हवऽ नऽ?'
हम एकाबैक पाछे मुङनी तऽ लगभग ७० वर्षीय लाठी ठेंगत बुढिया माई, जेके पथराईल आँख, ३२ भागे १६ गो दाँत (एगो हँसमुख कऽ निशानी) आ नेह-भाव अईसन कि करैला भी गदगद होके 'रसदार ऊख कप्टीशन' में अव्वल के दावेदारी करे लागे...। 
हम हकबकात बोलनी- 'काकी हम तहरा.....।' 
'अरे बेटा! हम खदेङन कऽ माई, भाग कऽ पोंछल सुभागी हई'। 
'ना काकी अईसे जनि कहऽ' 
आँख लोरिया गईल।
कुछ बतकही के बाद हमरा मालूम भईल कि सुभागी काकी के बियाह आजु से ६० बरिश पहिले केनो गाँवे भईल रहे, उनका अदमी के सर्पदंश से मौत होखला के बाद; उनका सर-समाज के लो गारी, हीन आ हेय नज़र से देखे लो। ऐही से ऊ अपना नईहर के पयान कइली आ कुछ दिन ठेकला के बाद नईहरो के लो 'पिंड छोङा लिहले'। एही से काकी आनि गाँवे मजूरी कऽ के पेट पालत रहली आ कुछ बरिश पहिले ऐह पंचायत भवन पऽ डेरा-डंडा डलले रहिं, आ तबे से खदेरना भी साथे बा......। आँखि किरिये, करेजा घेंघिया के रह गईल। 
'हाए राम!' 
छि:छि: केतना दुबर-पातर आ घटिया, समाज बा हमनि के कहाँ से विकास होई? उधिर 'मोदी जी' डिजिटल-इंडिया के आधारशिला रखत बानि आ इधिर हमनि के बानि जा जे ओही सोच पऽ दाल दरत बानि जा....। बाकिर हम अपना सुभागी काकी बदे ई दू लाईन जरूर परोसब - 
''धन्य बारू तू काकी धन्य बा अंचरा कोर। 
अभागा खेदरुआ जेकर पोंछतारु लोर!' 

'माई के ई प्यार-दुलार कवन पैमाना मापी? 
डिजिटल-इंडिया का करि जे धईलस मन के पापी!' 
----------------अभिषेक यादव
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