संपादकीय

कबले देह बिकाई?

जिनगी के अझुराई गाँठ जेवन रोज-रोज कऽ खिंचातान में अईसन फंस गईल बे; ऊ काहाँ-काहाँ जाले; का-का पावेले इहे ए कबिता के जान बा।
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एक देह पर सइ-सइ बोझा, कइसे आज खिंचाई
चाउर, दाल, नमक हरदी में-कबले देह बिकाई?

गलती पर गलती करि-करि के, लइका कइनी सात,
भइल बिलाला खइला बेगर, भेंटत नइखे भात,
तन उघार बा, कपड़ा नइखे, मिलतो कहाँ दवाई? एक देह पर...

कइली खून-पसीना दिन भर, मिलल मजूरी आधा,
ऊहा सेठवा छीन ले गइल, पेट प दिहलस बाधा,
हाड़ हिलल पर भार ना उतरल, गतर-गतर चिथराई। एक देह पर...

केहु के कुतवा दूध पिअत बा, केहु के पुतवा भूखल,
केहु के तोंद हाथ भर बाहर, केहु के पेटवा सूखल,
अरजी सुननिहार कहवाँ बा, आपन भइल पराई। एक देह पर...

एक त धरकच डहलस, दोसर बिटिया भइल सेयान,
कइसे हाथ पीअर होई, बेटहा भइले बैमान,
दिन में चैन ना रात में निंदिया, फाटल पाँव बेवाई। एक देह पर...
--------------------रामनारायण उपाध्याय
अंक - 32 (16 जून 2015)
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