संपादकीय

अंक - 29 (26 मई 2015)

बिकास औरी भूमंडलीकरन के ए जुग में गाँव बहुत पीछे छूटत जात बा। कुछ दसेक साल पहिले जेवन महता गाँव के रहे ऊ आज कहीं लऊकत नईखे। बिकास के ए भागा-भागी में गाँव खाली एगो सबद औरी जगह बनि के रहि गईल बा लेकिन गाँव ना तऽ खाली एगो सबद हऽ नाही खाली एगो जगह। गाँव एगो संस्कार हऽ औरी ओ सभ्यता के निसान हऽ जेवना के हमनी के पुरखा बड़ी मेहनत से खड़ा कईले रहलें। ई ऊ संस्कार जाहाँ अदिमी खाली अदिमी ना रहि जाला बल्कि अदिमी के समूह बनि जाला। ओकरी जिनगी में सभकर हक हिस्स होला तऽ सभकी जिनगी में ओकर।

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रमावती - डॉ० उमेशजी ओझा 
गरमी के करुआईल दुपहरिया में हम आपन ऑफिस से बाहर निकलनी. आ ऑफिस के सामने ही लागल घनघोर कुचकूच हरिहर अशोक के फेड के निचे जईसेही खाड होके शीतल हवा के आनन्द लेत जमाहि लेनी. ओसहि एगो हमरे विभाग में काम करेवाली औरत हमरा लगे आके एकेहाली हमरा छाती से लागी के रोये लगली. एक हाली त हमरा काठ मर दिहलस कि हम का करी आ ई औरत के ह. बाकी धेयान टूटल त पवनी कि ऊ रोयेवाली औरत हमारे जिला के रहेवाली रमावती हई. 
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खेलत रहलों बाबा चौवरिया 
आइ गये अनहार हो
राँध परोसिन भेंटहूँ न पायों 
डोलिया फँदाये लिये जात हो ।। 1।।
डोलिया से उतरो उत्तर दिसि 
धनि नैहर लागल आग हो
सब्दै छावल साहेब नगरिया 
जहवाँ लिआये लिये जात हो ।। 2।।
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