संपादकीय

रमावती - डॉ० उमेशजी ओझा

गरमी के करुआईल दुपहरिया में हम आपन ऑफिस से बाहर निकलनी. आ ऑफिस के सामने ही लागल घनघोर कुचकूच हरिहर अशोक के फेड के निचे जईसेही खाड होके शीतल हवा के आनन्द लेत जमाहि लेनी. ओसहि एगो हमरे विभाग में काम करेवाली औरत हमरा लगे आके एकेहाली हमरा छाती से लागी के रोये लगली. एक हाली त हमरा काठ मर दिहलस कि हम का करी आ ई औरत के ह. बाकी धेयान टूटल त पवनी कि ऊ रोयेवाली औरत हमारे जिला के रहेवाली रमावती हई. जिला जवार के होखेके नाते ऊ हमरा के आपन समझत रही. आ आपन हर दुःख तकलीफ हमारे से कहत रही. आखिर एह परदेश में आ एह विभाग में उनका खातिर हमरा के छोड़के उनकर केहू आपन ना रहे. जेकरा चलते हमार उनका घर से आवल जात होत रहे. हम उनका के रोअत देखिके चुप करावत.......... 

रमा.....रमा.......ये रमा पाहिले चुप होख. कुछ भईल हां का? आ केहू कुछ बोलऽल हां? कहतऽ मारी के ओकर थूथुन फोर दिही. बाकी रमा सुनेवाली जे कहा रही. बस एह घरी उनका एकेगो काम रहे कि ऊ हमरा के धके खाली रोअते जात रही. हम लाख समझावे के कोशिश कैइनि बाकी सभ बेकार रहे. उनका के आपन छाती से दबवले उनका बारे में सोचे लगनी.....ई लजायेवाली लईकी, बड ,जेठ, के बात मानेवाली, आ आदर करेवाली के आजू का हो गईल बा कि खाली रोअले जात बाड़ी. 

रमावती एगो खुबसूरत लमहर कद काठी के छरहर आ सुशिल औरत हई. उनकर बिआह सरकारी नोकरी करेवाला लईका से भईल रहे. बिआह के एके बरिश बितल रहे कि एगो हादशा में उनकर मरद के मृतु हो गईल रहे. ई एक बारिश में उनका एगो बेटा भी हो गईल रहे. पति के मृतु भईला के बाद उनका सरकारी नियम के अनुसार मज़बूरी बस अनुकम्पा प नोकरी करे के पडल. एक बारिश तक त उनका ऑफिस के सभ आदमी आ अफसर के दया आ सहानुभूति मिलत रहल. ओकरा बाद धीरे-धीरे उनका ऑफिस के सभ सहयोगियन के गिद्ध नजर उनका सुनारता प लागे लागल. आ सभकेहू चाहे लागल कि ऊ उनकर हो जईती. बाकी रमा चुपचाप आपन काम प आवस आ काम कऽके चली जात रही. केकरो से कुछो ना बोलत रही. जेकरा चलते सभ केहू “अंगूर खाट बा” कहत उनका चरितर प छिटा कसी करेसे भी तनिको परहेज ना करत रहले. 

एक दिन के बात ह ओह दिन भी दुपहरिया रहे, हम आपन काम से ऑफिस के छत प जात रही. ओह घरी रमावती से जान पहचान भी ना रहे, बस अतना जानत रही कि ऊ हमारे जिला के हई. छत प जाए खातिर बनल सीढी प धीरे-धीरे चढ़ऽल चलल जात रही. हमरा आगे-आगे ऑफिस के बाडा बाबू रमेश भी रहले . कुछ दुरी गईला प ऊपर से रमावती उतरत लउकली. जईसही रमेश उनका लगे पहुचले उनकर हाथ पकड़ी के रमा के साथे छेड़छाड़ करे लगले. आ रमा उनकर विरोध करे लगली. ई देखिके हमरा से सहल ना गईल, आ हम रमेश से कहनी ई का “ रमेश बाबू........का करत बानी, लाज नईखे आवत, घर में भाभीजी के रहलो प राउर ई हाल बा.” रमेश हमरा के गिदर भभकी देत कहले कि आपन काम देखऽ बीच में पड्बऽ त ठीक ना होई. आखिर हमरा भीतरी जिला के माटी रहे. हम उनका साथे भीड़ गईनी. आखिर में उनका रमा के छोड़े के परल. ओह दिन से रमा हमरा के आपन सुभचिंतक माने लगली आ आपन सभ दुःख तकलीफ बतावे लगली. 
आजू रमावती ऑफिस के पीछे अशोक के फेड के निचे हमरा के पकडीके रोअत रही आ उनका के चुप करावे में हम फेल रही. 
थोड़े देर रोअला के बाद आपन आखी में लोर लिहले कहल शुरू कईली.......
“ रउरा देखत आ सुनत बानी नु कि हमरा बारे में का-का अक्षरंग लगाके हमार चरितर प दाग लगवाल जात बा. जा हमरा पति के रहता भर में हमरा के आपन बड भउजी के आ महतारी के ओहदा देत रहे लोग , गोड छूके गोड लागत रहे, उहे आज आपना साथे रहेके नेवता देत बा. जब हम मना करत बानी त नोकरी से हटा देबे के बात कहिके कईसे तंग करत बा लोग . जवन काम आजुतकले ना कईनी उहो काम करे भेज देत बा लोग. अबही तक त हम सीताजी निहन साफ सुथर बानी बाकी कब तक रह पाइब ई राकशन कि बीच मालुम ना. अब द्रोपदी लेखा हमरो चिर हरण के समय आ गईल बा. अब हम अईसन नोकरी से तंग आ गईल बानी, सोचत बानी कि एह में हम साफ सुथर ना रह पाइब एह से नोकरिये छोड़ देब.” 
“ई का कहत बाडू, नोकरी मत छोड़, समाज में पसरल ई राक्षसन के कडा विरोध कर, ऊ लोगन के मुहतोड़ जवाब द . अईसन काहे नईखु करत कि अबही तहार लमहर जिनगी बा. कवनो बढ़िया लईका देखि के बिआह क ल. एह से राक्षसन के झटका भी लागी आ ओकरा बाद से ऊ तहरा के तंग कईल छोड़ दिहे. तहार जिनगी भी सुधर जाई, तहार बेटा के बापों मिल जईहे. अबही ऊ छोट बा बड़ भईला प ओकरा ईयादो ना रही कि ओकर असली बाबूजी के रहे.” 
कुछ सोचला के बाद रमावती........”शायद रउरा ठीक कहत बानी. अब हम बिआहे क लेब. सुनी ......एगो लईका बा ऊ हमारा पति के फुआ के लईका हवे. आ एहिजे कंपनी में कामो करेले. ऊ आपन चाहत भी कई हाली उजागर कईले. बाकी हमही उनकर बात ना सुनत रही कि लोग का कही. बाकी अब कवनो उपाय नईखे लउकत.” 
“ देख रमावती सोच समझ के बिआह करिह ऊ लईका कईसन बा ठोक बजा लिह. कही कवनो उच-नीच मत हो जाऊ.” 
“नाजी, हम देखत बानी ऊ सभ तरह से ठीक बाडन”. 
“ देख रमावती हमरा जहा तकले ईयाद बा, जवना लईका के तू कहत बाडू ऊ बिआहल हवे. आपन पहिलकी मेहरारू के छोड़ देले बाडन. अईसन मत होखे कि ऊ तहरो के , कही ऊ तहार पईसा खातिर त ना तहरा से बिआह कईल चाहत होखस. ओईसन आदमी प विश्वास कईल ठीक नइखे.” 
“ना अईसन बात नईखे हम जानत बानी कि ऊ आपन पहिलकी मेहरारू के छोड़ देले बाडन. सुभाव के ठीक बाडन हमरा साथे अईसन ना होई.” ^ 
“ठीक बा जब सभ जानियके बिआह करके सोचत बाडू त कवनो बात नईखे. हमार बहुत ढेर सारा बधाई .” 
दू दिन बाद रमावती बिआह के जोड़ा में ऑफिस आ गईली. ख़ुशी से बिआह कईला के सभ केहू के बीच मिठाई बटली. रमावती आजू बिआह के जोड़ा में सरग के परी लागत रहली. ऑफिस के लोग जे उनका देखिके आह भरत रहे ऊ लोगन के चेहरा मुरझा गईल रहे. सबसे पाहिले रमावती के अपना हाथ से निकलत देखिके ऑफिसर लोग उनका के बिना विभाग से पुछले दोसर बिआह करेके दोष लगाके निलंबित करवा दिहले. ओकरा बाद उनका बेटा के उनकर पति के नाम प मिलेवाला सहायता राशिओं बन करवा दिहले. 
रमावती के खिलाफ विभागीय कारवाही चलऽल. जवना में उनकर जवाब सुनिके बड ऑफीसर उनका के निलंबन से मुक्त कऽके फेरु से नोकरी प बोला लिहले. बाकी नोकरिवाला लईका से बिआह करके चलते उनका बेटा के उनकर मरद के नाम प मिलेवाला सहायता राशिओं बन कर दिहल गईल. 
एक वरिस बाद रमावती से भेट भईल. अबकी हाली रमावती एक दम उदास लागत रही आ माथा प सेनुर भी ना रहे. समझत देर ना लागल कि उनकर दुसरका पति उनका के छोड़ दिहले बा . हमरा रहलो ना गईल आ उनका से पूछनी “ का भईल रमावती........?”
“का कही .....रउरा ठीक कहत रही. ऊ हमरा से ना हमरा पईसा से बिआह कईले रहे. आजू हमरा लगे राखल जमा पूंजी ख़तम हो गईल त हमरा के छोड़ दिहलस आ तिसरका बिआह क लिहलस.” 
हम काठ मरला निहन रामावती के टुकुर-टुकुर निहारत रही कुछ बुझात ना रहे कि अब का कही. थोड़े देर बा कहनी “ अब का करके बा,” 
“बस कुछ ना अब आपन पहिलके पति के ईयाद करत जिनगी बिता देब. अब लोग चाहे जे कहे चाहे जवन हो जाय कवनो परवाह नईखे करेके. 

अतना कहते रमावती चली गईली. आ हम उनकर बुझाईल आशा के शांति मन से देखत रही गईनी.

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लेखक परिचय:-

पत्रकारिता वर्ष १९९० से औरी झारखण्ड सरकार में कार्यरत
कईगो पत्रिकन में कहानी औरी लेख छपल बा
संपर्क:-
हो.न.-३९ डिमना बस्ती
डिमना रोड मानगो
पूर्वी सिंघ्भुम जमशेदपुर, झारखण्ड-८३१०१८
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मोबाइल नं:- 9431347437

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