विविध

हम मजदुर हईं

मजदूरी हमर धरम
मजदूरी हमर करम
मजदूरी हमर संस्कार
मजदूरी हमर विचार
मजदूरी हमर जीवन के आधार
एहिसे होखेम हम भवसागर के पार
इहे करेला हमर सब चिंता फिकिर के दूर
हम मजदुर हईं।

प्रकृति के हम पुत्र हईं
मजदूरी से हम कुछ कमानी
जवन मिल जाला हमरा भाग्य से
ओहि से हम खानी
हम मजदुर हईं।

मंदिर मस्जिद से लेके गिरजा घर
सब हमहि बनाइले
आपन मजदुर धरम निभावे खातिर
सबकर गीत गायिले
हम मजदुर हईं।

हमर पसीना से सिचल् अनाज लोग खाला
कही भी कुछु होखे हमरे जात मारलजाला
सबका घर में हमहि करीले उजाला
हमरे वजह से सब ओरि प्रगति बुझाला
सबकर तकलीफ मिटाईले
आपन न करीले हम दूर
हम मजदुर हई॥

कबो पत्थर के तोड़ीले
कबो जिनगी के पेवन के जोड़ीले
अपना भाग्य के हमहि निर्माता हईं
कबो एकरा के हम अपनों से फोड़ीले
धरती हमर बिछौना हवे
आकाश हम ओढिले
हम मजदुर हईं।

इ संसार में सब केहु हमरे हवे
हमहू सब केहु के हईं
फिरू लोग हमके भुला देला
इनका सब के नियत के हम का कही
मानी त हमहि डॉक्टर
हमहि अभियंता
हमहि व्यापारी
हमहि बड़का बाबू
हमहि छोटका बाबू
हमहि सकल समाज हईं।
हम मजदुर हईं।

हमहि बेरोजगारी
हमहि मक्कारी
हमहि ईमानदारी
हमहि बेईमानी
हमहि लाचारी
हमहि तरक्की
हमहि साथी संघाती अउरी सखी
हमहि सब जाती
हमहि सब धरम
हमहि सब करम
हमहि सब भरम
हमहि सब मरहम
आज हमहि ममता
हमहि लोरी
गावं के पतल हमहि
शहर के हमहि कटोरी
ये भइया मान ली ना सब कुछ हमहि हईं।
हम मजदुर हईं।

हमरा में नइखे कवनो
इतना बड़का बनला के अहंकार
ये सब से हम हरदम रहिले दूर
हम मजदुर हईं।
-----------------जलज कुमार अनुपम
अंक - 22 (7 अप्रैल 2015)

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