विविध

अंक - 22 (7 अप्रैल 2015)

आज रऊआँ सभ के सोझा मैना के बाइसवाँ अंक परस्तुत बा औरी बहुते निक लागता कि धीरे-धीरे चलत-चलत ईहो अंक भी ले के आवे के मोका मिललऽ। अभी ले जेवन कुछ भईल सब बहुते छोटहन परियास बा लेकिन एगो उम्मीद के डेग बा औरी विसबास दियावता कि भोजपुरी साहित्य के काल्ह ओही इज्जत से देखल जाई जेङने दुनिया के बाकी भाखा के साहित्य के। 
- प्रभुनाथ उपाध्याय
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सोमार के सबेरे-सबेरे स्मिता रामधुन के गुण गान करत आपन मस्ती में डूबल काम प चलऽल जात रही . तबही राहता में सुरेश बाबु स्मिता के टोकले..... 
"काहो स्मिता! सबेरे-सबेरे बड़ा निक रामधुन में मगन होके चलऽल जात बाडू.” 
“ आरे का कही बाबूजी रउरा लोग के काम से फुरसत कहा मिलत बा कि भगवान के पूजा पाठ करी सकी . 
औरी पढ़े खाती>>>>>
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उसूलन के सूली पर लटकल

लम्हर छरहर दिन

रात के करिया समुन्दर में 

डूब गइल,आ

कुंवार भोरहरिया रांड़ हो गइल

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मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा।। टेक।।
आसन मारि मंदिर में बैठे,
नाम छाड़ि पूजन लागे पथरा।। 1।।

कनवां फड़ाय जोगी जटवा बढ़ौले,
दाढ़ी बढ़ाय जोगी होइ गैले बकरा।। 2।।
                                                                                  औरी पढ़े खाती>>>>> 
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                                                  मनरेगा बिगरलस खेती औरी खेतिहर मजदूर के हितई - 
                                             नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती

मनबोध मास्टर बहुत परेशान भइलें। खेत में खाड़ पाकल-फूटल फसल खड़ा रहल, कटिया खातिर मजदूर ना मिले। अरे भया! मजूर कहां से मिली? सब हजूर हो गइलन। दिल्ली-मुंबई जाके खटिहें लेकिन गांव में खटला में शरम लागी। जबसे मनरेगा आइल बा खेतिहर मजदूर मिलल मुश्किल हो गइल। जब घर बइठले प्रधान जी की मेहरवानी से मजूरी मिल जायेके बा त खेते-खेते देहिं के दुदर्शा करावला के कवन जरूरत बा।
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हम मजदुर हईंजलज कुमार अनुपम
मजदूरी हमर धरम
मजदूरी हमर करम
मजदूरी हमर संस्कार मजदूरी हमर विचार
मजदूरी हमर जीवन के आधार
एहिसे होखेम हम भवसागर के पार
इहे करेला हमर सब चिंता फिकिर के दूर
हम मजदुर हईं।
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