विविध

मरद के मरद - पईसा

ई कहानी आर्थिक तंगी से गुजरे वाला अईसन परिवार के बा जे बिना कुछ सोचले समझले बिना ओकर परिणाम शोचले अईसन कर देबे लन कि उनका जिनगी भर पछतावे के पडला . ई कहानी के नायेक राधारमण एगो प्रेस में काम करत रहले. तलब भी कम मिलत रहे. जेकरा से उनका आपन परिवार चलावे में दिकत त होते रहे. ओहू में नोकरी छुट जाये से ऊ आर्थिक तंगी से गुजरे लागले. आ अईसन हालत में चली गईले कि ऊ आपन परिवार त खतमे क दिहले आ आपनो ईह लीला ख़तम करे के कोशिश कईले. कहानी के पात्र आ स्थान के नाम के मिलाप मात्र एक संजोग हो सकत बा.
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सोमार के सबेरे-सबेरे स्मिता रामधुन के गुण गान करत आपन मस्ती में डूबल काम प चलऽल जात रही . तबही राहता में सुरेश बाबु स्मिता के टोकले..... 
"काहो स्मिता! सबेरे-सबेरे बड़ा निक रामधुन में मगन होके चलऽल जात बाडू.” 
“ आरे का कही बाबूजी रउरा लोग के काम से फुरसत कहा मिलत बा कि भगवान के पूजा पाठ करी सकी . एही से काम प आवे समय जवन थोड बहुत समय मिलेला ओही में भगवान के नाम ले लेबेनी .” 
“ बहुत बढ़िया , ठीक बा, ठीक बा, जा हाली-हाली सभ घरन के काम निपटाव .” “जी बाबूजी .” 
स्मिता सबसे पहिले राधारमण बाबू के फ्लैट में गईली . केवाड़ी पिटली बाकी केहू केवाड़ी ना खोलल . दोसरा हाली फेरु केवाड़ी पिटली , अबकियो हाली केवाड़ी ना खुलल . एह प स्मिता सोचे लगली कि आखिर केवाड़ी काहे नईखे खुलत , आजू तकले त अतना देरी नईखे भईल ? आजू का बात बा कि मलिकिनी केवाड़ी नईखी खोलत ? जबकि मालिको घरे में बाड़े . कही कुछुओ हो त ना गईल ? स्मिता एक हाली फेरु आवाज़ लगावत केवाड़ी पिटली , “ मलकिनी हम स्मिता केवाड़ी खोली काम करे आईल बानी .” अबकी हाली आधा केवाड़ी खुलऽल, भीतरी से राधारमण बड़ी घबडाईल झकले . जबले स्मिता कुछ कह पऽवती आ घर के भीतर जा पऽवती ओकरा से पाहिले राधारमण .........स्मिता अबही जा, बाद में आके काम कऽ दिह .” आ जल्दिये केवाड़ी बन क दिहले . 
स्मिता अगिला फ्लैट में काम करे खातिर बढ़ी गईली. बाकी ऊ परेसान रही आ सोचत रही कि आखिर का बात बा जे मालिक अतना घबराइल आ परेसान रहले ? कही कवनो अनहोनी त ना हो गईल बा ? बाकी आपन बेचयन धेयान के तुरत बडबडईली, “ ना अईसन कुछ एहिजा नईखे हो सकत , एहिजा फ्लैट में भला के आ सकत बा ? 
सभ फलटन में काम कईला के बाद स्मिता फेरु राधारमण के फ्लैट में गईली . फ्लैट में ताला लागल देखिके स्मिता चिहऽईली कि अबही त मालिक रहले आ अबही ताला मारिके कहा चली गईले ? थोड़ी देर राह देखला के बाद स्मिता भी आपन घरे चली गईली . दुपहरिया में फेरु काम करे गईली त देखली कि अबहियो राधारमण के फ्लैट में ताला लागल बा . ऊ बडबडऽईली, “ बुझात बा मालिक आपन बाल बच्चा के साथे कही चली गईले ? ” आ ईतमिनान से दोसरा फ्लैट में काम करे चली गईली . देखत-देखत तिन-चार दिन हो गईल . चौथा दिने स्मिता काम प अईली त ....... 
“ ई का राधारमण बाबू के फ्लैट के सोझा अतना भीड़ काहे ? का हो गईल बा ? आ उनकर केवाड़ी काहे खोलवावल जात बा ? तबही पुलिसों आ गईल . पुलिस के देखिके स्मिता भी भीड़ में शामिल होक तमासा देखे लगली . देखली कि मालकिन के बाबूजी , भाई , आ भउजियो भीड़ में शामिल बा लोग . बड़ी देरी तकले केवाड़ी ना खुलला प पुलिस केवाड़ी तुर दिहलस. ओकरा बाद फ्लैट के बहरी खाड सभ लोग घर के भीतरी गईलन . घर के भीतरी राधारमण के मेहरारू श्रुति आ उनकर चारी वरिस के लईका अमित मरल हाल में पलंग प पडल रहे लोग . ऊ दृस्य देखिके स्मिता के कलेजा फाटे लागल . ऊ आपना प काबू पावत कसहू भीड़ में से सरकत आपन मलकिनी के बाबूजी आ भउजी लगे जाके उनका के सहारा देबे लगली . दुनो लाश एकदम से सरी गईल रहे . जेकरा से बड़ी बदबू निकलत रहे . घर के भीतरी के हाल देखिके सभ केहू सिहर गईल रहे . आ सभेके मुह से एके बोली निकलल . कईसन आदमी बाडन राधारमण , आपन मेहरारू आ बेटा के मारी के ओही घर में रहत बाडन . ऊ आदमी ना आदमखोर हवे आदमखोर . फ्लैट के भीतर दुसरका रूम के केवाड़ी भी भीतरी से बन रहे . पुलिस शक प ओहू रूम के केवाड़ी तुरवादिह्लस . ओह में राधारमण आपन दुनो हाथ के गट्टा के नश काटी के बेसुध पडऽल रहले . खून के लाल रंग से पूरा रूम रंगा गईल रहे . अबहियो खून के धार चलत रहे . राधारमण के ईलाज खातिर अस्पताल में भरती करा दिहल गईल. 
दू दिन बाद राधारमण के होश आईला प पुलिस उनका से पूछ-ताछ करे अस्पताल पहुच गईल . पाहिले त राधारमण एनो ओने के बात करत रहले , बाकी जादा देरी तकले पुलिस के सामने टिक ना पवले . आ जवन कुछ बतवले ऊ एकदम से करेजा कपा देबेवाला रहे . 
राधारमण के बाबूजी एगो नामी कम्पनी में इंजिनियर बाडन . राधारमण के पत्रकारिता कईला के बाद एगो नामी गिरामी समाचार पत्र में कम्पूटर ओपरेटर सह समाचार संकलन के नौकरी लाग गईल . प्रेस में काम करे के चलते शहर के बड-बड लोगन से राधारमण के जानपहचान हो गईल . उनकर माई-बाबूजी राजधानी में रहत रहले . नोकरी लागला के बाद राधारमण के दोसरा शहर में रहे के पडत रहे . नोकरी के वरिस बीतत-बीतत राधारमण के बाबूजी एगो पढ़ल-लिखल लईकी श्रुति से राधारमण के बिआह करवा दिहले . ओकरा बाद राधारमण आपन मेहरारू के लेके आपना साथे आ गईले . एहिजा एगो किराया प फ्लैट लेके दुनो बेकत रहे लगलन . दुनो के गिरहस्थी सुखमय बीते लागल . वरिस भीतरे राधारमण के एगो खुबशुरत बेटा अमित के जनम भईल . बेटा के जनम के बाद राधारमण के जिमेवारी बढ़ गईल . अब उनकर प्रेस के दरमाहा से घर चलल मुस्किल होखे लागल . नामी गिरामी लोग से जान पहचान होखे के चलते उनका शराब के भी लत लाग गईल रहे . पईसा के कमी से अब ऊ आपन घर चलावे आ शराब के शौक पूरा करे खातिर राधारमण आपन बाबूजी से पईसा मांगे लगले . जब राधारमण आपन बाबूजी से पईसा के मांग करस त दुनो में अनऽबन हो जात रहे . उनकर बाबूजी कहत रहले नोकरी काहे नईख छोड़ देत , ई कईसन नोकरी बा कि तहार आपन परिवारों नईखे चलत . 
देखत-देखत अमित चारी वरिस के हो गईले . बेटा के नाम ईसकुल में लिखावावेके चिंता सतावे लागल राधारमण के . ऊ आपन बेटा के नाम शहर के बड ईसकुल में लिखवावल चाहत रहले . बाकी अड़चन आवत रहे पईसा . ई उलझन में रहले रहन कि समाचार पत्र के नोकरिओ छुट गईल . अब ऊ एकदम बेरोजगार हो गईल रहले . ओह में फ्लैट के किराया.......और सभ ना जाने का-का सोचत रहले .
पईसा के तंगी से लड़्त राधारमण एक दिन आपन प्रिये पत्नी से कहले कि “ श्रुति एगो कम कईल जाऊ कि ई भाड़ावाला घर छोड़ी दिही जा आ चल माई-बाबूजी के लगे उनके साथे रही जा . ऊ राजधानी ह ओहिजो बढ़िया- बढ़िया इसकुल बा ओहिजे अमित के नाम लिखावादिहल जाई .” श्रुति, राधारमण के बात मानेवाला जे कहा रही . उनकर मन त एही शहर में लाग गईल रहे . 
“ देखि जी , हम एह शहर से कतही जायेवाला नईखी . अईसन करी कि रउरा बाबूजी से कुछ पईसा लेली आ हमहू आपन बाबूजी से कुछ लेलेत बानी . कुछ दिन अईसे चली ओकरा बाद त राउर कही ना कही नोकरी लागिये जाई .” 
“ देख श्रुति हम बाबूजी से पईसा मांगल नईखी चाहत. मान ल कि एक घरी पईसा मंगियो लिही त आखिर अईसे कतना दिन चली .” 
“ ई रउरा समझी” . आखिर तंग आके राधारमण आपन बाबूजी लगे गईले . ओहिजा से लौटला प “ देख श्रुति बाबूजी एगो कंपनी में नोकरी लगावादेले बानी अब हमनी के दोसरा शहर में जायेके पड़ी . अईसन करत बानी कि तहरा के आ अमित के बाबूजी के लगे छोड़ देत बानी . तू लोग ओहिजे रहिह जब हम आपन जगह प सभ कुछ सहेज लेबी तब तहरा के साथे ले चलब .” 
“ देखि जहा रउरा जायेके बा जाई . हम एहिजे रहब कतही ना जईब . खास कर राउर माई- बाबूजी लगे . ओहिजा ढेर कामो करे के पड़ी आ रोज- रोज सासू के खिट – पिट. अगर रउरा हमनी के ना देखब त हम एहिजा कतही छोट-मोट नोकरी क लेबी . बाकी एहिजे रहब .” 
आखिरी बार राधारमण आपन मेहरारू श्रुति के समझावे के कोशिश कईले . श्रुति के पकड़ी के बोलले ......” अईसन काहे करत बाडू तनिक सोच नोकरी छुट गईल, घर भाडा के बा, भाडा काहा से आई , खाए- पिए के भी पईसा चाही . जानत बाडू मरद के मरद पईसा होला. पईसा बिन मरद एगो बिधवा लेखा होला. आखिर बाबूजी कब ले सहायता कारिहे .” 
“ हम कुछ नईखी जानत . रउरा सोची बिआह त रउरा कईले बानी. हम एहिजे रहब कही नईखी जाए वाला.” 
तबही राधारमण, श्रुति के पकड़ी के ठेलत पलंग प पटक दिहले . घर के जंगला प खडा होके अमित घर के बहरी झाकत रहले . पलंग प गिरला के बाद श्रुति कुछ समझ पवती राधारमण श्रुति के देहि प परी गईले आ श्रुति के गरदन पकड़ी लिहेल तब तकले श्रुति के कुछ ना बुझाईल . ओकरा बाद राधारमण, श्रुति के गरदन दबावे लगले श्रुति थोड़ी देर घिघिअईली आ जल्दिये थिरा गईली . आपन महतारी के घिघिआईल सुनी के अमित जोर-जोर से रोये लागल . अब राधारमण सोच में डूब गईले कि अमित त सभ जान गईल . केहू के बता ना दे. ओह छोट लईका के भी राधारमण आपन गोदी में उठाके चुप कराके श्रुति के बगल में सुता दिहले . कहले कि बेटा तू बहुत रोअत बाड चल तहरो के तहार माई लगे पहुचा देत बानी. ओकरा बाद पलंग प पडल तकिया लेके राधारमण ओह छोट लईका के मुह प धके जोर से दबा दिहले. जेकरा से अमित भी आपन माई के साथे बेसुध बेजान पड़ी गईले . जब दुनो महतारी बेटा में कवनो सुगबुगाहट होत ना देखले त उनकर होस आईल . 
रोये लगले ई हम का कऽदेनी अपने हाथे आपन प्राण से भी जादा मानेवाले मेहरारू आ बेटा अमित के अपने हाथे जान से मारी दिहनी ? अब कहा जाई, का करी, अब जेल जाए सेकेहू नईखे रोक सकत ? राधारमण के दिमाग काम कईल बंद कर दिहलऽस . लाश ले जासु त केने ? दुनो मातारी बेटा के लाश ओहितरे चारी दिन पलंग प पडल रहल . रोज राधारमण दुनो के ध-ध के रोअत रहले . ओह बीच में राधारमण एक दाना भी खाना के ना खईले. बड़ी कमजोर हो गईल रहले . लाश भी सड़ी गईल रहे . जब लाश के गंध निकले लागल त सेंट के भरल शीशी लाश प उड़ेल देत रहले. जेकरा से लाश के गंध फ्लैट से बहरी ना जात रहे. आखिर पाप के गगरी कब ले ना भरित ? एक न एक दिन त ओकरा उफनाये के ही परेला. आ उहे भईल राधारमण के साथे . 
दोसरा ओरी चार दिन से श्रुति के बाबूजी आपन बेटी से बात करे आ कुशल छेम जाने खातिर फोन लगावत रहले . फोन के घंटी त बाजत रहे बाकिर केकरो से उनकर बात ना हो पावत रहे. आखिर थाक हरी के श्रुति के बाबूजी, आपन बेटा , पतोही के साथे आपन बेटी के खोजे खातिर राधारमण के फ्लैट प आगईले . ओहिजा केवाड़ी में ताला लागल देखिके चिहईले . बाकी बेटी मोह में केवाड़ी के लगे खाड होक फेरु से राधारमण के फोन प फोन कईले, घंटी बाजे लागल. घंटी के आवाज़ फ्लैट के भीतरी से आवत रहे. जब ऊ केवाड़ी से सटी के फ़ोन के आवाज़ सुने लागले त एगो अजीब महक उनका नाक में घुसल . ओह प ऊ थाना गईले आ पुलिस के लेके राधारमण के फ्लैट प आ गईले . फ्लैट के केवाड़ी तुरवावल गईल जहवा श्रुति आ अमित के लाश मिलऽल . ओकरा बाद पुलिस राधारमण के जेल भेज दिहलऽस.
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लेखक परिचय:-

                                                   नाम: डाo उमेशजी ओझा
पत्रकारिता वर्ष १९९० से औरी झारखण्ड सरकार में कार्यरत

कईगो पत्रिकन में कहानी औरी लेख छपल बा

संपर्क:-

हो.न.-३९ डिमना बस्ती

                                                    डिमना रोड मानगो

पूर्वी सिंघ्भुम जमशेदपुर, झारखण्ड-८३१०१८
ई-मेल: kishenjiumesh@gmail.com
मोबाइल नं:- 9431347437

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