संपादकीय

अंक - 9 (11 जनवरी 2015)

आज हम रऊआँ सभ के सोझा मैना कऽ नऊवाँ अंक ले के हाजिर बानी। एह अंक में दू गो रचनाकारन कऽ रचना सामिल बाड़ी सऽ। एगो गजल तऽ दोसरका निरगुन हऽ।
- प्रभुनाथ उपाध्याय
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चुप रहल अब त कठिन बा, कह दिहल बहुते कठिन
अइसन कुछ बात बा, बाटे सहल बहुते कठिन॥

एह घुटन में के रही, कइसे रही ए यार अब
एह फिजाँ में हो गइल साँसो लिहल बहुते कठिन॥

लाज के बा लाज लागत आज के माहौल में
बेहयाई के लहर में अब रहल बहुते कठिन॥
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तोर हीरा हिराइल बा किंचड़े में।। टेक।।
कोई ढूँढे पूरब कोई पच्छिम, 
कोई ढूँढ़े पानी पथरे में।। 1।।
सुर नर अरु पीर औलिया, 
सब भूलल बाड़ै नखरे में।। 2।।
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