संपादकीय

अंक - 8 (11 दिसम्बर 2014)

आज रऊआँ सभ के सोझा मैना कऽ अठवाँ अंक परस्तुत बा। ।एह अंक में दू गो रचनाकार कऽ रचना सामिल बा एह अंक के सुसोभित करत बाड़ी सऽ।
- प्रभुनाथ उपाध्याय
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घेरि-घेरि उठलि घटा घनघोर और कजरार, सावन आ गइल !
बेबसी के पार ओते, अवरु हम ए पार, सावन आ गइल !

घिरि अकासे उड़े बदरा, मेंह बरसे छाँह प्यारी ओ !!
जरत बाटी हम तरे कल, क पकड़ के बाँहि, प्यारी ओं !

लड़ति बा चिमनी घटा से, रोज धुआँधार, सावन आ गइल !!
उठति बा मन में तोहें, कजरी पुकारि-पुकारि, प्यारी ओ !
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आजि काल्हि गइया के दसवा के देखि-देखि
हाइ हाइ हाइ रे फाटति बाटे छतिया।

डकरि-डकरि डकरति बाटे राति दिन
जीभिया निकालि के बोलति बाटे बतिया।

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