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सावन आ गइल - रामदरश मिश्र

श्री रामदरश मिश्र जी हिन्दी के एगो बहुते बरिआर साहित्यकार हवीं। इहाँ के कबिता, कहानी, उपन्यास, ललित निबन्ध औरी संस्मरण नियन साहित्य ले लगभग सगरी बिधन में आपन लोहा मनववले बानी। उँहा के भोजपुरी में थोरी बहुत लिखले बानी। ओही में से एगो गीत रऊआँ सभ खाती परस्तुत बा।
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घेरि-घेरि उठलि घटा घनघोर और कजरार, सावन आ गइल !
बेबसी के पार ओते, अवरु हम ए पार, सावन आ गइल !

घिरि अकासे उड़े बदरा, मेंह बरसे छाँह प्यारी ओ !!
जरत बाटी हम तरे कल, क पकड़ के बाँहि, प्यारी ओं !

लड़ति बा चिमनी घटा से, रोज धुआँधार, सावन आ गइल !!
उठति बा मन में तोहें, कजरी पुकारि-पुकारि, प्यारी ओ !

झकर-झकर मसीन लेकिन, देति बा सुर फारि, प्यारी ओ !!
रहे नइखे देति कल से, ई बेदर्द बयार, सावन आ गइल !

खेत में बदमास बदरा, लेत होइहें घेरि, प्यारी ओ !!
छेह पर लुग्गा सुखत होई, तोरे अधफेरि, प्यारी ओ !
पेट जीअत होई पापी, खाइ-खाइ उधार, सावन आ गइल !!
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अंक - 8 (11 दिसम्बर 2014)

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