संपादकीय

छन-छन के बनल-बिगड़ल

भोजपुरी में जौहर शफियाबादी जी के काम औरी नाम एतना बड़ बा अब ए केवनो परिचय के मोहताज नईखे। उँहा के दूगो गज़ल जेवन रंगमहल दिवान से लिखल गईल बा रउआँ सब खाती।
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छन-छन के बनल-बिगड़ल टाँकल बा हथेली पर,
आवेले हँसी हमरा जिनगी का पहेली पर।

शुभ याद के परछायी सुसुकेले अंगनवाँ में,
जब चाँदनी उतरेले सुनसान हवेली पर।

जीअत आ मुअत खाता लागत बा कि बेटहा ह,
जे गाँव के तड़कुल का बइठल बा मथेली पर।

अब विधने भरम राखस चुटकी भ सेनुरवा के,
धड़कत बा करेजवा की गुजरल का सहेली पर।

जिनगी का अन्हरिया में कइसन ई अँजोरिया ह,
बा नाव लिखल कवनो मनरूप चमेली पर।

‘जौहर’ जे निरखले बा नियरे से जिनिगिया के,
विश्वास करी ऊ का माया के बहेली पर।

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