करनी के भोग - उमेश कुमार राय

रोपेया के चमक-दमक जब आपन रुप देखावे ला त मति फिरि जाला,आंखि प गुरुर के छोपनी चढ़ि जाला,मति उलुटा हो जाला आ मन बेलाम घोड़ा बन जाला।बड़का- बड़का ज्ञानी लोगन के चाल मातल हाथी जस हो जाला आ मति निमन- के भेद भुला जाले। सोच उलुटा हो जाला।धर्म के राहि छोड़ के मानव अधरम में आनन्द ढूड़े के असफल परेयास करेला। दोसरा के दुख दे के आ नीचा देखा के आपना के बड़ साबित करेला।एकरा खातिर तरह-तरह के षडयंत्र के पुलिंदा आपन मगज मे उपराजत रहेला तब नियति विनास के प्रालब्ध के विधान करम-किसमत में लिखेला आ फिरु शुरु होला शारीरिक ,मानसिक,आर्थिक अउर समाजिक पतन।लोग जानेला कि नियति सबसे बलवान होले,ऊ तीनों लोक के विजेता रावनो के ना छोड़लस त साधारण आदमी के का बसाई। अइसने हाल मुखिया जी के रहे।

मुखियाजी के तीन गो लईका रहन। तीनों पियकड़ आ बड़की लफुआ।एगो बड़का सराब पी के गल्ली-नली में ढिमिलियात रहे। दुसरका चिलम के सुरुकी मारि के भोले शंकर के गोहरावत रहे।तीसरका हिरोनची रहे। तीनों से टोला भर के लोग परसान रहत रहन। केहुओ आपना दुआर प चढ़े ना देत रहे काहेकि तीनों हथलुफूक रहसन।

ओहनी के संघतियो केहू ना रहे। अगर गलती से कवनों लईका से बतियावत ओहनी के गरजीवन देख लेस त लईकन के डांट-फटकार होखे लागत रहे। ऊ तीनों जवना राह से चलस ,लईका राह बदल लेत रहसन। एहि से तीनों के संघतियारो आपना से बड़हन उमीर के नशेडीयन से रहे। ऊमीर बीतल जात रहे बाकिर एको आगुआ ना आवत रहन। मुखियाजी कवनों बेटिहन के बाखान के फांस में फांसा ले आवस त उनकर विरोधी लोग बिआह भाड़ि देस।अब त मुखियाजी के आपन लईकन के कुंआरपथ के डर सतावत रहे।मुखियाजी आपना साथे रहे वालन चमचन से आपन हीतई-नतई में बिआह करावे कहस त चमचा लोग दांत निपोर के कहस कि हमनी के हीतई-नतई कवनों लईकी बिआह जुगुत नइखीसन। कवनों चमचा बिलाई के गाला में घंटी बन्हे प तेयार ना रहसन काहेकि नसेड़ी से बिआह करावला के बाद हीतई-नतई से भी हाथ धोवे के पड़ीत। आतना बाड़का मुखिया खातिर भाठ के भरी। अइसन बिआह के अगुअई के बढ़नी मारS ना त ई अगुअई गरदन के ढोल बन जाई जवन बाद में फंसरी बन जाइ त कवनों बड़हन बात नइखे। एह से चमचा लोग दांत निपोरि के बाहाना बनवले में आपन भलाई समझस।

एगो उहो दिन रहे जब मुखिया जी के गांव-जवार में तूंती बोलत रहे।इनकरा साथ रहे में आपन ईज्जत के बात जानत रहे लोग। होते पराते उनुका से भेंट करे खातिर उनुका दुआरा प आदमी के दरगाह लागत रहे। उनुका से दू -बात बतियावे खातिर लोग इंतजार करत रहन बाकिर बेलगाम सवारथ आ लोभ के अइसन आंन्ही बहववलन कि उनकर सभ बनल-बनावल आकारथ हो गइल। लोग उनुका के देख के राह बदले लगलन। एकर उनुका आभास होखे लागल रहे। आपन भविष्य के अगरम भी बुझात रहे बाकिर गरुर के बरियार छोपनी देखलो प अनजान बने प मजबूर बना देत रहे। ऊ कबो-कबो दिमाग में भंजावस त उनुकर चापलूसी फउज आतना बाखान करे कि उनकर मति हेरा जात रहे , विचार लासारा जात रहे। कुकरम आ सुकरम के भेद चापलुसी में भोरा जास। कुकरम के ढेरि प अइसन बढ़वार धराईल कि दिन-दूना रात-चउगुना बढे लागल। हालात कब उलूटा बेयार आंधी में बदललस उनुकरा समझे से पहिले बवंडर बन गइल। सभ ढाक के तीन पात। अब पछताय का जब चिड़िया चुंग गइल खेत। आपना के सुधारे के खूब परेयास कइलन बाकिर सभ अकारथ। का बरखा जब किरीसी सुखाने। अब हतासा में विचार कुंठित हो गइल।

जब आग-पाछ सभ गड़बड़ाए लागल त ऊ आपन गुरु जी के पास जाए के तेयारी कइलन। गुरुजी उनरा के असकुली में पढ़वले रहन। पहिले जब मति कवनों बात प अझुरा जात रहे त ऊ उनुका के राह देखावत रहन। मुखियई के बाद आतना सलाहकार साथ हीं आगे-पीछे लागल रहन कि उनुका गुरुजी के तलबे ना बुझाइल। जब आग-पाछ के लोग डूबत नाव से कूदि के परइले तब गुरुजी के ईयाद आइल।

"आव-आव मुखिया! बढ़ि दिना बाद लउकलS, गुरुजी के एकदमे बिसराइए देले बाड़S।", गुरूजी के बानी में व्यंग झलकल।

"पांव लागत बानी गुरूजी!", मुखियाजी आपन कपार प के पगरी उतार के गुरुजी के पांव में रख देलन। आंखि ढबढबा गइल। गला भरि गइल।


थरथरात कहलन, "हम भारी चकोह में फंसल बानी। हमरा के निकले के राह देखाई गुरुजी!"

"का बात बा मुखिया?", गुरुजी पुछलन।

मुखिया जी गुरुजी के पांव पकड़ के फफक-फफक के पुका फारि के रोए लगलन। गुरुजी के कठेया मार देलस। पत्थर के मुरत जस हो गइलन। उनुका मुंह से बाकार ना फुटल । कुछ देर बाद गुरुजी आपना के सम्हरलन आ मुखिया के बांह पकड़ के बइठका में ले गइलन। जग से गिलास में पानी डालत गुरुजी कहलन,


"पहिले पानी पी के आपना के सम्हारS। जीत-हार लागल रहेला।"

गुरुजी उनुका बगल में बइठलन आ ढाढस बंधावे खातिर उनुका पीठ प हाथ फेरे लगलन। मुखियाजी कुछ देर बाद हिचकी लेके शांत भइलन। उनकर आंख से गंगा-जमुना बह के दूनों गाल से ठूढि तक लाईन खिंचले रहे जवना के गवछी के कोना से बीच-बीच में मुखिया साफ करे फिराक में लागल रहन बाकिर फिरु से लाईन बन जात रहे।

"तूं अकेले होत पराते भींनसहरे आ गइलहा। अभी मुंह लुकाने बा, तोहार ढेरे दुसुमन बाड़न। कहीं ऊंच-नीच हो जाइ तब?", गुरुजी तनि भिकराह हो के पुछलन।


"आराम से बइठS, चाह लेके आवत बानीं।", कह के गुरुजी बगल के दुआरि में समां गइलन।

मुखियाजी उब-चुभ में पड़ल रहन। संकोच के जवन चादर उतारि के दुआरा से चलल रहन ऊ पीछा ना छोड़त रहे। गुरुजी जतने देर करत रहन ऊ संकोच के चादर रजाई जस गंभीर होत जात रहे। ऊ समझ ना पावत रहन कि आपन बात कइसे कहस। फिरु हिया प पत्थर रख के सोचले कि आपन हिया के सभ बोझ गुरु के सामने यही ठईया रख देब तबे गुरुजी कवनों रास्ता निकलिहे। बाकिर कुछ कल-छपट के बात बा ऊ कईसे बताइब। फिर सोचले कि गुरुजी से कह देब कि राजनीति में ना चाह के भी ई सभ करे के पड़ेला।

"मुखिया कवना सोच में पड़ल बाड़S। कब ले आइल बानी,चाह के कप तोहरा ओर बढवले बानी बाकिर तूं कवना सोंच में डूबल बाड़S।ल चाह पिअS।", मुखियाजी हड़बड़ाहट में चाह के कप पकड़लन। कुछ बुंद छलकल बाकिर सम्हर गइलन। हाथ ना जरल।

चाह के सुरुकी के साथ गुरुजी पुछलन-
"आतना उनमुनाहे आवे के का कारन बा? सभ ठीक-ठाक बा नूं ? आतना जरुरी रहे त खबर भेजवा देत,हम्हीं आ जइती। "

नाहीं गुरुजी,पियासल कुइंया के पास आवे ला। कुइंया पियासल के पास ना जाला। रउंआ जइती त सभे जानित,हम अकेला में मिलल चाहत रहीं। एहसे उनमुनाहे आ गइनी हां।", मुखियाजी एकसुरिये कहलन।

"ठीके कइलहा ,कहS का बात बा ? साफ-साफ सुरु से अंत तक सभ बात कहब त समाधान मिल जाइ।"- गुरुजी बिना लाग लपेट के मुद्दा प अइलन।

दूई घंटा बितल मुखियाजी के बात पूरा होखे में। गुरुजी उनकर बात सुनत रहन आ चेहरा के भाव बदलत रहे।

कबो-कबो त गुरुजी के खींसी चेहरा लाल हो जात रहे बाकिर गंभीर हो के बिना टोका-टोकी के सभ बात सुनले। जब मुखियाजी के बात ओरा गइल तब गुरुजी शुरु भइलन,
"मुखिया ! तूं तीन बार एकसुरिए जीतलहा। गांव के विकास करे के चाहीं त तूं आपन गोल बनावे खातिर आपन टोल के सभ नबोज लईकन के शराबी बना देलहा। तूं ना जानत रहलहा कि तोहरो लईकवा ओहनिए साथे रहेला। संगत से गुन होला आ संगत से गुन जाला। संगत में आ के तोहार लईका सभ गड़बड़ा गइले। ऊपर से तोहार करमों बढ़िया ना रहल। तूं सुनले बाड़S नूं कि फले पुत्र पिता के धरमे। तोहार करनी के भोग अपने साथे लईकन के भी भोगावत बाड़S ।जोजना के धन हड़पल ऊ सरकार के ना ऊ गरीबन के हक रहे। तूं गरीबन के हक खा के सही सलामत कइसे रह सके ल ।अउर - त - अउर धन खातिर विधवा के मरवा देल ? सोवरग-नरक एहीजे बा। आपन करनी के भोग एहीजे भोगे के बा। जब आदमी निरंकुश हो जालन त उनका प नियति अंकुश लगावे ले। करनी के निमन-बाउर भोग ई जनम कम पड़ेला त आगिलो जनम में भोगे के पड़ेला।ई प्रालब्ध कहाला जवना के त्रिदेव भी ना बदल सकेले। हम का ? एकरा में देवता-पितर कुछउ ना कर सकेलन। मखिया तूं जा,आपन आदत सुधार के करनी के भोग भोगS। हम एह में भागीदार ना हो सकीला। अब तूं जा सकेलS।"

कह के गुरुजी हाथ जोरि लेलन।
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उमेश कुमार राय
जमुआँव,भोजपुर (बिहार)।

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