कइसे लेहीं उतराई हो - राम जियावन दास 'बावला'

बतलावा दूनों भाई हो, रघुराई हो,
कइसे लेहीं उतराई हो।

लालच बस लेईं खेवाई, डर लागेला जे सुनि पाई,
दुनियाँ मोर हँसी उड़ाई हो, रघुराई हो,
कइसे लेहीं उतराई हो।

तूँ भव समुद्र से करत पार, हम पार करत नदिया औ नार,
हम तूँ दूनों भाई-भाई हो, रघुराई हो,
कइसे लेहीं उतराई हो।

नहीं जात से खेवा लेते, हो सके तो दावत देते,
यह हमरे कुल लगि आई हो, रघुराई हो,
कइसे लेहीं उतराई हो।

रउवाँ तनी भले बिचारीं, कइसे कुल रीत बिगारीं,
मोर जाति-पांति छुटि जाई हो, रघुराई हो,
कइसे लेहीं उतराई हो।

मुदरी अँगुरी में डारा, जंगल में करी सहारा,
घर चला करीं पहुनाई हो, रघुराई हो,
कइसे लेहीं उतराई हो।

जब तोहरे घाट पै अइबे, तब आपन नाम बतइबै,
तोहऊँ मत लेहा खेवाई हो, रघुराई हो,
कइसे लेहीं उतराई हो।

बावला मरम कई बानी, सुनि बिहँसे सारंग पानी,
माझी ने विनय सुनाई हो, रघुराई हो,
कइसे लेहीं उतराई हो।
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लेखक परिचय:-
जनम: 1 जून 1922, भीखमपुर, चकिया
चँदौली, उत्तर प्रदेश
मरन: 1 मई 2012
रचना: गीतलोक, भोजपुरी रामायण (अप्रकासित)

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