मक्खड़ पहलवान। एही नाँव से उनुके सभे बोलावे स्कूल में। पढ़े - लिखे में जेहे - सेहे। पहलवानी में खूब मन लागे। रोज अखाड़ा पर जा के दू - तीन घंटा कसरत कइल आ कुश्ती लड़ल - लड़ावल उनुके काम रहे। घरो से पूरा छूट रहे। बाप - दादा पहलवान रहलें त मक्खड़ो के पहलवान बनावे के सोचि लिहले रहलें। कहे लोग कि घर में एगो पहलवान रहहीं के चाहीं। ए से मक्खड़ के खाना - खोराक के पूरा इंतजाम रहे। रोज पाँच लीटर भँइस के दूध, घीव, काजू, किसमिस, बादाम आ ऊपर से बढ़िया भोजन के इंतजाम रहे। मक्खड़ रोज कसरत क के स्कूले आवसु, क्लास में सबसे पीछे के लो बेंच पर बइठसु, हाई बेंच पर मूड़ी धरसु आ खर्राटा लेबे लागसु। ना मास्टर, ना छात्र केहू का उनुका सुतला से कवनो एतराज ना रहे। सभे जानत रहे कि इनका पहलवान बने के बा, पढ़ाई - लिखाई बस नाँव खातिर करे के बा। स्कूले आ जात बाड़े, उहे बहुत बा।
त भइल ई कि एकदिन मक्खड़ एगो दरखास ले के हेड मास्टर साहेब के आफिस में गइलें। हाथ में दरखास देखते हेड साहेब कहनीं कि तू छुट्टी के दरखास काहें ले के आइल बाड़ऽ? तहरा खातिर त रोजे छुट्टी बा। जा पहलवानी करऽ। केतनो दिन बाद अइबऽ तब्बो केहू कुछ ना कही, ना कवनो कारवाई होई। बढ़िया पहलवान बनि जइबऽ त एहू स्कूल के त नाँव होई।
मक्खड़ कहलें - 'ना सर, ई छुट्टी के दरखास ना ह। पहिले पढ़ि लीं।'
हेड साहेब दरखास ले के पढ़नीं। ओ दरखास में लिखल रहे कि ए स्कूल में जे चाहे हमसे लड़ि ले। हम चुनौती देत बानीं कि हम केहू के पीठि लगा सकत बानीं। हमार पीठि केहू नइखे लगा सकत। आ जेकर पीठि लागि जाई ऊ ओही बेरा से लंगोटा खोलि के ध दीं। फिनु कहियो लंगोटा ना पहिनी। पहलवानियो छोड़ि दी।
हेड साहेब का दरखास पढ़ला के बाद बड़ा अचरज भइल। उहाँ का कहनीं -' ई त अहंकार, गरूर आ भरम के भाषा लिखल बा हो। अइसन चुनौती ना देबे के चाहीं। के जानत बा कि एतना छात्र लोग में केतना पहलवान बाड़ें? केहू तहके हरा दी त बहुत शिकायत होई। चाहें, तूही केहू के पीठि लगा दऽ त ओकरा पहलवानी के जिनिगिए खत्म हो जाई। हार - जीत, पटकल - पटकाइल त कुश्ती में होते रहेला लेकिन लंगोटा खोलि के ध दिहल, पहलवानी छोड़ि दिहल ई त बहुत भारी शर्त बा हो। हम तहरा पुरुखा - पुरनियाँ लोग के जानत बानीं। बहुत लड़ाका रहे लोग आ बड़लो बा लोग। कहीं पीठी धूरि नइखे लागल। तहरा साथे कुछ हो जाई त ओहू लोग के जगहँसाई होई। ए से ई दरखास ले लऽ आ जा मनगुमे रहऽ। स्कूल के खेलकूद प्रतियोगिता में कुश्ती होई त केहू से लड़ि लिहऽ।'
मक्खड़ का हेड साहेब के सलाह नींक ना लागल। ऊ कहलें कि खेलकूद प्रतियोगिता के बेरा कुश्ती होई त ओ बेरा देखल जाई। ए बेरा निहोरा करऽतानीं कि हमार चुनौती पूरा स्कूल के पढ़वा - सुनवा दिहल जा।
हेड साहेब बड़ा बाबू के दरखास दे के कहनीं कि एकर बिधिवत सूचना बना के हर बर्ग में पढ़ि के सुना दिहल जा।
सूचना हर बर्ग में सुनावल गइल। स्कूल में हल्ला मचि गइल कि मक्खड़ स्कूल के केहू पहलवान से लड़े चाहत बाड़ें। केहू लड़े के तइयारे नइखे।
दू - तीन दिन बाद कुछ छात्र लोग के बहुत कहला - सुनला पर मक्खड़ से एक क्लास ऊपर के रमेश कुश्ती लड़े के तइयार भइलें। हालाँकि रमेश मक्खड़ से दू बरिस से जियादहीं जेठ रहलें लेकिन उनुके कदकाठी मक्खड़ से हेठ रहे। अब स्कूल में बिधिवत सूचना दिया गइल कि बुध के तीन बजे मक्खड़ आ रमेश के कुश्ती स्कूल के कम्पाउंड में होई।
अब मक्खड़ मांग शुरू कइलें कि कुश्ती के समय एक घंटा रही। हेड साहेब कहनीं कि कुश्ती एक घंटा ना होला। दस से पाँच मिनट में सब फरियाद जाई। फिनु कहलें आधा घंटा रही। मने होत - जात आ समुझावत - बुझावत कुश्ती के समय दस मिनट रखाइल।
बुध के दिने तीन बजे के पहिलहीं छात्र अखाड़ा के अगल - बगल जउरिआए लगलें। अखाड़ा विद्यालय के ओर से कोड़वावल रहे। तीन बजे मक्खड़ आ रमेश दुनू पहलवान कुश्ती खातिर हाथ मिलवलें आ कुश्ती चालू हो गइल। थोरहीं देर में बुझाए लागल कि मक्खड़ रमेश पर भारी परत बाड़ें। खैर, रमेश कवनो तरे एन्ने - ओन्ने करत आपन मान सम्मान बचा लिहलें। समय पूरा हो गइल। कुश्ती बिना कवनो फैसला के खतम भइल।
बिना फैसला के कुश्ती छुटला के टीस मक्खड़ के मन में रहि गइल। रमेश आ रमेश के समर्थन करेवाला कहसु कि रमेश कुश्ती ना लड़ल रहितें त मक्खड़ बिना लड़लहीं अपना के स्कूल चम्पियन कहे लगतें।
खैर, कुछदिन बाद मक्खड़ फिनु से उहे दरखास स्कूल में दिहलें। ए बेर दरखास के जानकारी होते उनहीं के बर्ग के एगो अनजान लरिका दीपक हेड साहेब के लिखि के दिहलें कि हम मक्खड़ से कुश्ती लड़बि। दीपक देखे में मक्खड़ से बहुते कमजोर लागसु। उनुका से उमिरियो में कम रहलें। तब्बो मक्खड़ के ओर से फिनु उहे मांग भइल कि एक घंटा, आधा घंटा, पनरह मिनट के कुश्ती। आखिर दसे मिनट पर फिनु फैसला भइल।
कुश्ती के स्थान तिवारी बाबा के बगइचा चुनाइल। कुश्ती होखे के दिन चारू ओर के गाँवन से देखवइया हजारन लोग एकठ्ठा हो गइल रहलें। दुनू पहलवान आ ओ लोग के समर्थक अखाड़ा के दू ओर जमल रहलें। दुनू ओर के लोग इंतजार में रहे कि जबरदस्त लड़ाई होई। आपुस में बात होखे कि हई सिंकिया पहलवान मक्खड़ से लड़ि के पटकइबे नू करिहें। उनुका आगे ई का बाड़ें? मक्खड़ हाथी आ ई चिंउटी। मक्खड़ इनके पंखा जनि उखारि देसु। इनका मक्खड़ से ना लड़े चाहत रहल ह।'
दीपक के समर्थक लोग बतियावत रहे कि देह पर नइखे जाए के। मक्खड इनका से ढेर ताकतवर आ बरियार लागत बाड़े त का भइल? कुश्ती खाली बल आ जांगर से ना होला। कुश्ती लड़ल एगो कला ह। अगर दीपक हिम्मत से काम लिहें आ कला जानत होइहें त इनके पीठि लगाइए के छोड़िहें। मर्द के बच्चा बा दीपका, मर्द के। देखऽ लोग ना, ओकरा चेहरा पर तनिको चिंता भा हड़बड़ी के निसान बा?
अइसहीं बतकही चलत रहे तले हेड साहेब कुश्ती शुरू करे के भिसिल बजा दिहनीं। जवार के दू गो बूढ़ पहलवान लोग जज के रूप में दुनू ओर कुर्सी पर बइठल रहे। दुनू ओर से दुनू पहलवान कलाबाजी करत, उछलत - कूदत अखाड़ा में पहुँचलें। ताली के गड़गड़ाहट आ जोश बढ़ावे वाला सोर से असमान गूँजे लागल।
दुनू पहलवान हाथ मिलवलें। हुजूम हाथ मिलावत देखल। लेकिन ई का भइल? सबके आँखि फाटल के फाटल रहि गइल। सबके नजर दीपक पर टीकि गइल। जवन मक्खड़ लड़ाई खातिर एक घंटा समय मांगत रहलें उनुका के दीपक बीस सेकेंड के भीतर ना जाने कवन दाव मरलें कि लोग इहे देखल कि मक्खड़ पीठ के भरे गिरल बाड़ें आ दीपक उनका छाती पर बइठल बाड़ें।
भइल सोर कि मक्खड़ के दीपक बीसे सेकेंड में पीठि लगा दिहलें। दीपक के समर्थक दीपक के कान्ह पर उठा के जय जयकार करे लगलें।
मक्खड़ आ उनुका समर्थक लोग के मुँह लटकि गइल। उनुके समर्थक लोग में केहू मक्खड़ के भला - बुरा कहे त केहू तोख धरावे। धीरे - धीरे सभे अपना घरे गइल।
मक्खड़ ओकरा बाद ना स्कूले अइलें ना लंगोटा पहिनलें। आजुओ मक्खड़ आ दीपक बाजार में आवेलें। मक्खड़ दीपक के देखते कगरिया के एन्ने - ओन्ने ताके लागेलें जइसे उनके चीन्हते ना होखसु।
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प्रधान सम्पादक, सिरिजन, भोजपुरी पत्रिका।
मुसेहरी बाजार, गोपालगंज, बिहार।

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