बुधन फुलेसर के घरे औचक पहुँचलें। पहुँचते बइठे खातिर कुर्सी दियाइल। बुधन आराम से बइठि के एन्ने - ओन्ने ताकत नाक - भौं सिकोरत बिना लाग - लपेट कहलें - 'बइठका के ई कवन दशा बनवले बाड़ऽ हो? इहाँ तऽ बइठहीं के मन नइखे करत।'
फुलेसर सुनते भौंचक्का रहि गइलें।
'काहें, का भइल बा? कहीं कचरो - कंजास त नइखे लउकत? बहारनो तऽ कोन में नइखे रखल? कवनो कपड़ो - लत्ता तऽ एन्ने - ओन्ने नइखे रखल? फिनु तहरा का अइसन बुझाइल हऽ कि इहाँ बइठे के मन नइखे करत?' - फुलेसरो रिसिआइले पुछलें।
'पूरा बइठका में लरिकन के खेलवना छिटाइल बा। कहीं कुछ तऽ कहीं कुछ। हो कोने गेना, हे कोने प्लास्टिक के गाड़ी। हई रसोई बनावे वाला लरिकन के खेले वाला बर्तन। हर जगह तऽ कुछ ना कुछ पसरले बा। ए हालत में केकरा दू मिनट बइठल जाई? तूही ध्यान से देख ना कि बाउर लागत बा कि ना?' - बुधन फुलेसर के ई सब छिटाइल सामान अंगुरी घुमा - घुमा के ए तरह देखवलें जइसे फुलेसर के लजवावत होखसु।
फुलेसर कहलें - 'आरे भाई, लरिका बाड़ेसँ त खेलबे करिहेंसँ आ खेलिहेंसँ तऽ खेलवाड़ छिटइबे करी। तहरा घरे लरिका नइखनसँ का?'
'बाड़ेंसँ। लेकिन मजाल का कि ए तरे घर - दुआर बना देउ लोग। हमार बइठका अइसन ना रहेला। लरिका खेलिहेंसँ भा ना खेलिहेंसँ, अइसन कबाड़खाना बनइहें त पिटाए लगिहें।' - बुधन रोब झारत कहलें।
कबाड़खाना के नाँव सुनि के फुलेसर का रीसि बरि गइल। कहलें - 'देखऽ नू बुधन, नानी के आगे ननिअउरा के ढेर बखान कऽ दिहलऽ। हम अइसन नइखे कि तहार घर, दुआर आ बइठका नइखीं देखले। कहीं बहारन तऽ कहीं जूठन, कहीं धोती फेंकल तऽ कहीं कुर्ता फेंकल। जहें मन करे तहें चप्पल उतारि दिहल। का - का बताईं आ का - का ना बताईं तहरा घर के हाल। देखऽ, हमरा घरे भागि से लरिका बाड़ेसँ तऽ खेलबे करिहेंसँ। आ खेलिहेंसँ तले ओ कुल्हिन के खेलवाड़ छिटाइल रही। लरिकन के किलकारी सरगो में ना देखि पइबऽ। हमरा तऽ बहुत अच्छा लागेला आ भगिमान बानीं कि हमरा घर - अंगना लरिकन के हुरदुंग होत रहेला। तहरा बाउर लागत बा भा बरदास नइखे होत तऽ किरिपा के के आजु के बाद हमरा दुआर पर मति अइहऽ।'
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प्रधान सम्पादक, सिरिजन, भोजपुरी पत्रिका।
मुसेहरी बाजार, गोपालगंज, बिहार।

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