नैना झरे हरसिंगार - भोलानाथ गहमरी

पात-पात दुअरे के महुआ फुलाइ गइल
अँगना फुलेला कचनार।
कि हो मोरे अँगना फुलेला कचनार…

हमरी अटरिया पऽ चाँदनी थिरके,
चाँदनी थिरके तऽ पायलिया झनके,
नैना झरे हरसिंगार।
कि हो मोरे अँगना…

मोरे पिछवरिया रे घनी बंसवरिया,
घनी बंसवरिया से जुड़ली उमिरिया,
पोरे-पोरे हो गइली भार।
कि हो मोरे अँगना…

तूँ परदेसिया मरम न बूझे,
मरम न बूझे कहाँ जा के उलझे,
मुरझे ना सपना के हार।
कि हो मोरे अँगना…

लहरेला चउरा पऽ तुलसी के पाती,
तुलसी के पाती या असरा के थाती,
पूजा बा मन के पियार।
कि हो मोरे अँगना…
------------------------------
लेखक परिचय:-
जनम: 19 दिसंबर 1923
मरन: 2000
जनम असथान: गहमर, गाजीपुर, उत्तरप्रदेश
परमुख रचना: बयार पुरवइया, अँजुरी भर मोती और लोक रागिनी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

मैना: भोजपुरी साहित्य क उड़ान (Maina Bhojpuri Magazine) Designed by Templateism.com Copyright © 2014

मैना: भोजपुरी लोकसाहित्य Copyright © 2014. Bim के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.