शहर के चमक जब आँख ले चहुँपे ला तऽ पहिले नजर चौधिंया जाला। बहुत देर कुछ लउकबे ना करेला। बाकिर धीरे-धीरे जब आँख ओह चमक के सोख लेला तऽ बुझाला कि भीतर से कुछ टूट रहल बा; कुछ छूट रहल बा। आँख के रोशनी में तनी पानी आवे लागेला। बुझला जे कि आँख तनी बुझा गइल बे। ई पानी कुछ अउर ना, बाकिर कमी से जनमेला। बात के कमी, छूअन के कमी, आ एह एहसास के कमी कि शहर के भीड़ में हम अकेला नइखीं!
नोएडा के एक गो गेटेड सोसाइटी रहे—बड़ नाँव, बड़हन गेट अउरी हर जगह कैमरा। एही सोसाइटी में ग्यारहवाँ मंजिल पर रजनी रहत रहली। पति विकास एगो आईटी कंपनी में रहलें। जिनगी ऊपर से देखीं तऽ एकदम सेट रहे। कार, क्लब के मेंबरशिप, हर महीना जाने केतने नया सामान अउरी साल में कइगो छूट्टी; कबो देहरादून, सिक्किम तऽ कबो पटाया। बाकिर मन जब ना लागे तऽ ई सभ भइल ना भइल बरोबर हो जाला।
रजनी के भीतर के हाल कुछ अइसने रहे जवन धीरे-धीरे रिसत रहे।
रजनी पहिले एगो प्राइवेट बैंक में नौकरी करत रहली। जिनगी में बहुत भाग-दौड़ रहे। सांझ-सबेर में बहुत फरक ना रहे। जिनगी में खाली बैंक रहे। शादी के बाद जब विकास उनसे कहलें -
“काम छोड़ दऽ, आराम से रह। घर-दुआर देखऽ। हम बानी न।”
ई सुन के रजनी के लागल जइसे सरग के सुख मिल गइल। बहुत खुश भइली। कई बरिस के भागम-भाग के बाद रजनी में सच में, आराम मिलल रहे। बिहाने उठल, चाह पियल, घर सवाँरल, टीवी देखल, आ कबो-कभार जब मन करे तऽ तनी पढ़ल, बस एते काम रहे। घर के काम करे खातिर दिनभर एगो काम वाली रहे।
बाकिर कुछ महीना बीतत रजनी के दिन अचके लमहर लागे लागल। जइसे दिन के केवनो सिरा ना होखे! कब शुरू भइल, कब खतम भइल, बुझइबे ना करे।
ओही समय विकास के दुनिया अलग चले लागल। उनकर जिनगी में मीटिंग, कॉल, अउरी टारगेट में अझुरा गइल।
सबेरेहीं से रजनी के दुनिया में सांझ के इंतजार करे लागे।
“आज जल्दी आइब का?” ऊ कई बेर पूछस।
“कोशिश करब,” जवाब हर दिन एके जइसन मिले।
धीरे-धीरे रजनी पूछल छोड़ दिहली।
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एक दिन, सोसाइटी के पार्क में सांझी खा नया-नया बनल सखी के संगे घूमत रहली। उनकर सखी कहली,
“रजनी! काल्ह से हम सोसाइटी के किट्टी पार्टी ज्वाइन करत बानी। तूहूँ करबू?”
रजनी के पहिले तऽ बुझइबे ना कईल का जबाव देस। बाकिर थोरी देर बाद पूछली,
“का-का होला ओह पार्टी में?”
“काल्ह चलऽ। निक लागी तऽ आगे अइहऽ, ना तऽ केवनो बात ना”
रजनी मान गइली।
रजनी अपना सखी के संगे पार्टी में गइली। उहवाँ सभ आपन-आपन परिचय देबे शुरू कइल।
केहू के पति विदेश में रहत रहे, केहू दोसरा शहर में तऽ केहू के पति बच्चा दूनो जाना शहर से बाहर रहत रहे।
रजनी चुपचाप बाकिर हरान हो के सुनत रहली। अब बुझाइल कि ई खालीपन बहुत घरन में फइलल बा।
जब उनकर बारी आइल तऽ ऊ आपन परिचय ले ना करा पवली!
ओही ग्रुप में एगो औरत चुप देखि के सीधे पूछ लिहली,
“तू का चाहत बाड़ू?”
रजनी चौंक गइली,
“का मतलब?”
“मतलब, तू खुश बाड़ू? सच-सच बताव।”
ई सवाल सीधा रजनी के दिल में उतर गइल। जवाब तुरंत ना निकलल।
थोरी देर बाद ऊ धीरे से कहली—
“पता ना…”
“तऽ पता करऽ“
ओह रात रजनी बहुत देर तक जागत रहली। छत देखत-देखत सोचत रहली।
दूसरका दिन ऊ अपना पुरान फाइल निकलली। सगरी डिग्री, सर्टिफिकेट अउरी पुरनका अनुभव के कागज।
धूल जम गइल रहे।
ऊ धीरे से हाथ फेरली, अउरी फाइल चमक उठल।
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लेखक परिचय:-
नाम: राजीव उपाध्याय
पता: बाराबाँध, बलिया, उत्तर प्रदेश
लेखन: साहित्य (कविता व कहानी) एवं अर्थशास्त्र
संपर्कसूत्र: rajeevupadhyay@live.in
दूरभाष संख्या: 9650214326
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