सन्नाटा - राजीव उपाध्याय

जब ऊँच-ऊँच मकान लउके लागे तऽ मन कह देला कि शहर आ गइल बा। आ जब मकान दस-बीस तल्ला होखे तऽ लाग जाला कि केवनो राजधानी में पहुँच गइल बानी। दिल्ली के ऊँच-ऊँच फ्लैटन के दसवाँ मंजिल पर सीमा अपना पति के संगे रहत रहली। सुग्घर जिनगी खाती जेवन चीझ चाहीं सभ घर में रहे। बड़हन घर, सगरी कमरन में एसी, फ्रिज में भरल सामान आ ड्राइंग रूम में बड़हन टीवी। बढ़िया जिनगी खाती अउर का चाहीं?

बाकिर जिनगी बड़ा अजीब होले। आदिमी पहिले मेहनत कऽ के घर के कोना-कोना में सामान भर ले ला अउरी जइसहीं घर भर जाला मन कुछ अउरी खोजे लागेला। एगो खाली मन भरल में करवट बदले लागेला। सीमा के जिनगी कुछ अइसने हो गइल रहे। उनका दिन भर फ्लैट एक कमरा से दूसरा कमरा में आवत-जात हमेशा कहीं कुछ खाली लागे।

सीमा के शादी पाँच साल पहिले अरुण से भइल रहे। अरुण एकगो मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर रहलें। एगो छोट गाँव से निकलल अरूण के नजर हमेशा आसमान में लागल रहे। हरमेसा व्यस्त, हरमेसा फोन के स्क्रीन के ऊपर-नीचे करत, हमेशा “तनी काम बाकी बा” कहत।

पहिले-पहिले सब ठीक रहल। घूमल, हँसल, छोट-छोट बात पर खुश भइल। बाकिर धीरे-धीरे अरुण के काम बढ़त गइल, आ उनकर सीमा से बातचीत घटत गइल। अब हालत गइल रहे कि दिन भर में दूनो परानी के बीच बस जरूरी बात होखे।

“खाना खा लिहल?”
“देर हो जाई आज।”
“बत्ती बंद कर दिहा।”

शहर खाली आसमान में ऊँच उड़े खाती सपना अ उरी सपना पूरा करे खाती सामाने ना देला बाकिर आदिमी के सभकरा से बिलगा देला। आदिमी भीड़ में अपना सपना में डूबल जाला अउरी उनकर परिवार उनकरी सपना के पूरा होत देखत रहेला अउरी ओकरा बुझइबे ना करेला कि ऊ करे तऽ का करे?

सीमा के इहे हाल हो गइल रहे। सीमा के मन में कई बेर सवाल उठत—
“का शादी एही के नाम हऽ?”

बाकिर ऊ खुदे के समझा लेत—
“कुछ समय बा सभकर जिनगी एही तरह हो जाला।”

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एक दिन, लिफ्ट खराब हो गइल। सीमा सीढ़ी से नीचे उतर रहल रहली। बीच में सातवाँ मंजिल पर एगो बुजुर्ग मइया बैठल मिलली—हाथ में थैली, माथा पर पसीना।

“बिटिया, जरा पानी मिल जाई?” ऊ धीरे से कहली।

सीमा तुरंते अपना बोतल दे दिहली।
“रुक जाईं, हम नीचे ले छोड़ देत बानी।”

रस्ता भर दूनो परानी में थोरी-बहुत बात भइल रहल। बात होखे कइसे सीढ़ी चढ़ला से मइया के सांस चले लागल रहे। बस एतने पता चलल कि उनकर नाव कमला देवी हऽ आ अकेले रहेली। बेटा-बेटी सब बाहर बस गइल बा।

ओह दिन के बाद सीमा मन जब-जब उदासी से भर जाओ, कमला देवी के लगे चलऽ जात। उहवाँ चाय बने आ मइया अपना पुरान दिन के कहानी निकालस अउरी देखत-देखत सांझ हो जाए। सीमा के मन जेवन बात रहे ऊ मइया से कहस। सभसे जरूरी चीझ ई भइल कि दुनो परानी के बात करे कारन ना खोजे के परे।

“हमार जमाना में,” कमला देवी हँसत कहली, “लोग गरीब रहल, बाकिर बात खुब करे।”

सीमा मुस्कुरा दिहली, बाकिर भीतर कहीं कुछ धंस गइल।

एक दिन सांझि खा जब अरुण फेर देर से घर अइलें, सीमा चुपचाप खाना परोस के उनकरा लगे बइठ गइल। आज ऊ कुछ बोलली ना। चुपचाप अरूण के चेहरा पऽ टुकुर-टुकुर देखे लगली। बाकिर रोज नियर आजो अरुण फोन में उलझल रहलें।

अचानक सीमा पूछ पूछली—
“तोहरा याद बा, हमनी के आखिरी बेर कब एक संगे साथ में हँसल रहलीं जा?”

अरुण के बुझाइबे ना कइल कि सीमा का पूछ लिहली। थोरी देर बाद जब बुझाइल तऽ पूछलें
“का मतलब?”

“मतलब… बिना जल्दी में, बिना फोन के, बिना काम के… बस हमनी।”

कमरा कुछ देर खातिर एकदम शांत हो गइल। एसी के आवाजो तेज लागे लागल।

अरुण धीरे से फोन नीचे रख दिहलस।
“नइखे मन परत। लागता कई बरिस हो गइल।”

सीमा के आँख भरि आइल, बाकिर ऊ रोवली ना। बस धीरे से कहली—
“हम अकेले परि गइल बानी, जबकि तू साथे बाड़ऽ।”

ई बात सीधा दिल पर लागल।

ओह रात दूनो बेकत देर ले बतियवलें। पहिले दूनो जाना के बुझइबे ना कइल कि बतियावस तऽ बतियावस लो का? बाकिर धीरे-धीरे दूना जाना खुलल गइल लो। अरूण के धीरे-धीरे पुरान बात इयाद आवे लागल। नया-नया बियाह के दिन, कुछ शिकायत, छोट-छोट खुशी, जाड़ा के रात में संगे खाइल आइसक्रीम सब बाहर आवे लागल।

अगिला दिने, अरुण जल्दी घरे आ गइल।
“जल्दी चाह बनाव। चाह पियला के बाद हमनी पार्क में चलल जा।”

सीमा हरान रहली, बाकिर खुशी के रहे।

नीचे शहर अबहियों उतने शोर में डूबल रहे, बाकिर ओह दसवाँ मंजिल पऽ पसरल सन्नाटा टूट गइल रहे।
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लेखक परिचय:-
पता: बाराबाँध, बलिया, उत्तर प्रदेश
लेखन: साहित्य (कविता व कहानी) एवं अर्थशास्त्र
संपर्कसूत्र: rajeevupadhyay@live.in
दूरभाष संख्या: 9650214326

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