कहानीकार ‘आरोही’ जी - केशव मोहन पाण्डेय

भाषा के दिसाईं देखल जाव तऽ भोजपुरी राजनैतिक रूप से खाली धोखा आ असरा धरवला के भाषा रहल बा। अनेक साहित्यिक, सांस्कृतिक आ राजनैतिक अगुआ भोजपुरी के सरकारी मान्यता आ सम्मान खातिर अनेक जोर लगवले बाड़ें बाकिर सफलता ढेर नइखे मिलल। ओह अगुआ लोग में अनेक जने त अइसन हठी रहल बाड़े कि भोजपुरी माने अपने के बुझले बाड़ें आ आजुओ बुझेे लें। जे हर दिसाईं समृद्ध रहल बा, ऊ सभे भोजपुरी के नाँव पर अपनहीं माथे ताज सजवले के फिराक में रहल बा। सभा-संस्था के बहाने ई भ्रम पलले रहल बा कि भोजपुरी माने ऊहे खाली। भोजपुरी ओही महानुभाव के पाकेट से निकले ले आ ओही महानुभाव के ईशारा पर नाचेले। बाकिर भोजपुरी के ढेर अइसनो साधक बाड़े जे चुपचाप मुड़ी नेवा के अपना साधना में लागल बाड़े। रहीम दास के ‘एकै साधे सब सधै’ वाला मंत्र पर अमल करत ना मंच-मचान के फेर में बाड़े, ना मठ-मठाधीश के। भले अइसन साधक लोग के नाँव अँगुरी पर गिनावे वाला बा तऽ का, प्रेरक आ प्रभावशाली बा। भोजपुरी के प्रति समर्पित ओही प्रेरक जीव में से एगो रहनी चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह ‘आरोही’ जी।
चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह ‘आरोही’ जी व्यावसायिक रूप से तऽ कृषि निरीक्षक से प्रखण्ड कृषि पदाधिकारी के पद तक पहुँच गइनी आ फेर सहायक पाट-प्रसार पदाधिकारी से सेवामुक्ति ले अनुमंडलीय कृषि पदाधिकारी के रूप में डाल्टेनगंज, पलामू में काम कइनी। उहाँ के एक नोकरी के पारिवारिक स्तर पर भले खूब चर्चा होत होई बाकिर मातृभाषा भोजपुरी से तनी ढेर लगाव रहे। साहित्य लिखला के सथवे सहेजलो में ऊहाँ के एगो प्रेरक व्यक्तित्व रहनी। 
माई भाषा से ओहिसने लगाव होला, जवन लगाव माई से होला। भले मनई अपना रोजी-रोजगार के कारने देश-विदेश में रहे के विवश होखे, कवनो भाषा बोले के विवश होखे बाकिर जे तरे दुलार करेवाला सगरो नारी माई नइखी हो सकत बाड़ी, ओही तरे व्यवहार में आवे वाला सगरो भाषा मातृभाषा नइखे हो सकत। माई से दूर चाहे मजबूर रहलो पर जब सपनों में दर्शन हो जाला तऽ मन भरदिन चहकत रहेला, ओही तरे मातृभाषा बोले वाला कवनो मनई अगर परदेशो में मिल जाला त हियरा एगो अलगे अनुराग से हूलस जाला। भोजपुरी से हमनी के उहे राग बा। भोजपुरी लिखे के शुरूआत हम एम.ए. में कइनी। ‘लोक-साहित्य’ पेपर के बहाने भोजपुरी के कुछ साहित्यन से ढेर परिचय भइल। डाॅ. अरूणेश नीरन सर के संपादन में छपे वाला पत्रिका ‘समकालीन भोजपुरी साहित्य’ पढ़त-पढ़त एगो लघुकथा ‘पैडमैन साहेब’ पढ़नी। लेखक के नाँव नइखे इयाद, बाकिर ओही ‘पैडमैन साहेब’ के कारणे हमरो भोजपुरी लेखन के गाड़ी पटरी पर धीरे-धीरे सरके लागल। ओही के परिणाम भइल कि कथा-कहानी लिखे लगनी। छपहूँ लगनी आ आकाशवाणी गोरखपुर से प्रसारणों होखे लागल। 
समय के आन्हीं में बड़ा जोर होला। बड़का-बड़का पेड़न के सोर उखड़ जाला। समय के ओही आन्हीं में उधियात हम दिल्ली आ गइनी। रोटी-रोजगार के जोगाड़ में समय बीते लागल आ ‘भोजपुरी पंचायत’ के संपादक कुलदीप श्रीवास्तव के प्रेरित कइला के कारणे 2013 में हमार पहिलकी किताब ‘कठकरेज’ के प्रकाशनों हो गइल। ‘कठकरेज’ शायद कवनो माध्यम से चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह ‘आरोही’ जी के हाथ में पहुँचल। ऊहाँ के पढ़बो कइनी आ पाछे के कवर पर दिहल फोन नम्मर पर फोन कइनी। ऊहाँ के आपन परिचय देहनी कि ‘हमहूँ भोजपुरी लिखेनी-पढे़नी आ सहेजबो करेनी। हम पालम में आइल बानी। हमार नाती लोग ईहाँ रहेला लोग। तनी अस्वस्थ बानी ना त हम रउआ डेरा पर अइतीं। संभव होखे तऽ आईं। भेंट होई आ परिचयो बढ़ी। 
एगो नया लेखक के पहिलकी किताब के देख के कवनो वृद्ध-समृद्ध साहित्यकार नेवता देंऽ तऽ कइसे केहू ना जाई। हम गइनी। भेंट भइल। ढेर देर ले बात भइल। कइगो कला सीखे के मिलल। जइसे कि किताब के विषय-सूची कवना-कवना तरीका से बनावे के चाहीं। कहानी के क्रम के तरे रहे के चाहीं, आदि। मन खुशो होखे आ ज्ञानो मिले। ऊहाँ के ओतने देर में हमरा लेखन-विधा, हमार जनम-धरती, हमार खर-खानदान, पूरखा-पुरनिया, रीति-नीति, सगरो के बारे में जान लेहनी। बतिअवला में तनी अजीबो लागे। लागे कि ई बूढ़ऊ का पूछत बाड़े। एकर का मतलब का हमरा लेखन से। बूढ़उती में शउर भूला गइल बाड़े का। 
देखनी कि ढेर कागजन के लम्बा-लम्बा चिट बनल बा आ ओही पर बड़ा पसन्न से सगरो जानकारी ‘आरोही’ जी लिखत बानी। ओही बाति में पँवरिया लोग के बात उघरल। हम आपन अनुभव बतवनी। ऊहाँ के ओह लोग कइगो सामाजिक परिचय देहनी। जब साँझ के झोंटा वातावरण में छितराए लागल तब हम डेरा पर लवटे के इच्छा बतवनी। विदा करत ‘आरोही’ जी निर्देशित कइनी कि ‘एगो भोजपुरी एकांकी चाहीं।’ हम भेजे के वादा क के सँझवत के पंछी जस डेरा पर आ गइनी।
बातचीत आ उहाँ के साहित्य के पढ़ला से जवन जानकारी मिलल त पता चलल कि चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह ‘आरोही’ स्कूली शिक्षा के दरम्यान 1952 से हिन्दी आ भोजपुरी में दोहा के रचना करे लगनी, 1960 ई0 में ‘अँजोर’ में ‘बसंत’ कविता छपल। ओही समय-खंड में चौधरी जी के मन कहानी पढ़े में खूब लागे। कहानीयन के भाव से गिलास भरे लागल त छलकहूँ लागल। कहनी लिखाहूँ लागल। ओही के देन रहे कि 1967 ई0 में पहिलकी कहानी के रूप में ‘खन्दान के इज्जत’ छपल। तब से कहानी लिखे के सिलसिला शुरू हो गइल। नौकरी के कारने चौधरी जी के भोजपुर से बाहर दोसरो भाषा के क्षेत्र में रहे के पड़ल। ओह कारने ईहाँ के भाषा में अउरियो भाषा के शब्द सउना गइल बा। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन में शुरूआती दौर से जुड़ रहनी आ ओकरा प्रतियोगितन में सम्मिलित होत रहीं। एही सब साहित्यिक मेल-मिलाप से भोजपुरी कहानियो के सृजन होत रहे। 
चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह ‘आरोही’ जी गद्य-पद्य दूनो में रचना कइले बानी। पद्य में गीत, गजल, दोहा, सोरठा-बरवै, सवैया, कवित, विरहा, चैता, कजरी आदि लिखले बानी त गद्य में कहानी, लघुकथा, समीक्षा, नाटक, एकांकी, प्रहसन आदि के भरमार बा। गद्य विधा में कहानी पाठक लोग के बीचे सबसे अधिक लोकप्रिय साहित्य के रूप ह। साहित्य अइसन संसार के सृजन करेला, जहाँ हँसी-खुशी, ईर्ष्या-अमरख, हमार-तोहार, हम-तुम के सगरो भेद बिला जाला। साहित्य के ओह संसार में कहानी के एगो विशेष आपने दुनिया होले। कथाकार अपना कथा-सिरजना आ कथा-पात्रन से अइसन दुनिया के सिरजेला जवना में पाठक अपना के भुला जाले। कथा-कहानी के हो जाले। कथा-कहानी के पात्र हो जाले। पात्रन के सगा-संबंधी हो जाले। समय केतनो तेजी से आपन पाँख फड़फड़ावे त का, हर जवार, हर जुग, हर रंग, हर राग आ हर मौसम में कथा-कहानी के आपन रंग होला। चौधरी जी के भोजपुरी के ऊ कहानी सिरजले बानी, जवन भले अपने-आप में तनी अलगा होखे, बाकिर अनेक में आपन अलग पहिचान तऽ बनवलहीं बा। आरोही जी के सगरो कहानी अपना अलग-अलग रस से पाठगण के रोमांचिंत करे में सक्षम बाड़ी सों। 
चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह ‘आरोही’ जी के लिखल कहानियन में यथार्थ के धरातल पर जिनगी के पसँगा में बइठल घटना बाड़ी सों। पढ़त बेरा कहानियन के सगरो घटना आपन लागेली। छछात हो जाली सगरो घटना। पाठक के मन में चाव जागे लागेला, चित्त चंचल होखे लागेला आ चरित्र व्यक्तिगत। दू-तीन गो कहानी-संग्रह के देखे-पढे़-गुने के अवसर मिलल बा। जहाँ ‘बड़प्पन’ कहानी में एगो गरीब गनिया टमटम वाला आ ओकरा मन में उमड़त दया के सागर के वर्णन बा ओहीजा ‘अब ना होई’ में समाज में फइलल ढकोसला के पर्दाफास बा। ‘कहीं भला’ शीर्षक कहानी में ढ़ोंगी-ढ़कोसला के विस्तार से चर्चा आ कथानक के सिरजना बा। एही तरे ‘परकटा पंक्षी’, ‘हिसाब’, ‘मोल’ आ ‘अनुमान’ जमीन से जुड़ल रोचक का पठनीय कहानी बाड़ी।
‘आरोही’ जी के दोसरकी कहानी संग्रह ‘सही मंजील’ में स़ह कहानियन के संकलित कइल गइल बा। ‘नदी के किनारा’ कहानी के कथानक गाँव के भूतहा जगह पर बा तऽ ‘कटहर’ में गँवई राजनीति आ प्रशासनिक मिलीभगत के कथानक बा। ‘धोबियापाट’ छेदी सिंह, मोहन आ राबिना के दांव-पेंच पर बा त ‘धूर’ कहानी में गरीब किसान के पीड़ा के पराकाष्ठा बा। ‘साधु’ कहानी भलेआदमी के व्याख्या करत बिआ त ‘देशद्रोही’, ‘सही-मंजिल’ आ ‘चीख’ पढ़ला के बाद पाठक के ढेर देर ले ‘कथा-गइल बन में, सोच अपना मन में’ के चरितार्थ करे वाला कहानी बाड़ी सों। 
चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह ‘आरोही’ जी के एगो अउरी लोकप्रिय कहानी संग्रह ‘बेगुनाह’ बा। एह संग्रह में अठारे गो कहानी संकलित बाड़ी। एह संग्रह के लगभग सगरो कहानी पुस्तक के पहिले अनेक पत्र-पत्रिकन में छप गइल रहली। ई सन् 2000 के पहिले के छपल उहाँ के तीनों कहानी-संग्रह बा। हमरा से जब भेंट भइल रहे तब उहाँ के अपना कहानी ‘दइँत’ आ ‘सवाल’ के खूबे चर्चा कइले रहनी। हम ‘बेगुनाह’ पढ़ले नइखी बाकिर आरोही जी से एह संग्रह के कहानियन पर ढेर चर्चा भइल। 
खाली कहानिए खातिर ना, चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह ‘आरोही’ जी के भोजपुरी भाषा आ साहित्य खातिर कइल काम अनेक भाषा-साहित्य पे्रमी लोग खातिर अनुकरणीय त बड़ले बा, संचितो बा। आरोही जी के साहित्य आजुओ निरन्तर छप रहल बाड़ी सो। ‘आरोही रचनावली’, इनसाइक्लोपीडिया भाग-एक आ भाग-दू, कथा-कोश आदि अनेक संग्रह सामने आइल बाड़ी आ आ रहल बाड़ी। आरोही जी जइसन प्रेरक व्यक्तित्व उहाँ के सुपुत्र आ साहित्यकार श्री कनक किशोर जी बानी, जे उहां के लुकाइल-भुलाइन पांडुलिपियन के साहित्य-संसार में समाहित करवावत बानी, प्रकाशित करवावत बानी। आरोही जी के समग्रता से समझे खातिर असली भोजपुरिया मन राखे के पड़ी आ मुड़ी नेवा के, दाएँ-बाएँ के बेआर से बेअसर बनि के भोजपुरी के सेवे के पड़ी। 
आजु चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह ‘आरोही’ जी पंचतत्व में विलीन हो गइल बानी बाकिर उहाँ के आखर-आखर वातावरण में सुगंधित होत बा। आजुओं उहाँ के लेखनी के संपादित कइल जात बा, सामने लेआवल जात बा। संपादन के जिमवारी बड़ जिमवारी ह। नीर-क्षीर के अलगा करे के जिमवारी ह। सांपदन के बेरा संपादकगण के ई आभास त रहते होई। एगो समय पक्का आई, आरोही जी के कहनियन जस सगरो रचना संसार पाठक के हिया में हली आ सबके मन में आपन आभास कराई।
---------------------------------- 
लेखक परिचय:-
2002 से एगो साहित्यिक संस्था ‘संवाद’ के संचालन।
अनेक पत्र-पत्रिकन में तीन सौ से अधिका लेख
दर्जनो कहानी, आ अनेके कविता प्रकाशित।
नाटक लेखन आ प्रस्तुति।
भोजपुरी कहानी-संग्रह 'कठकरेज' प्रकाशित।
आकाशवाणी गोरखपुर से कईगो कहानियन के प्रसारण
टेली फिल्म औलाद समेत भोजपुरी फिलिम ‘कब आई डोलिया कहार’ के लेखन
अनेके अलबमन ला हिंदी, भोजपुरी गीत रचना.
साल 2002 से दिल्ली में शिक्षण आ स्वतंत्र लेखन.
संपर्क –
पता- तमकुही रोड, सेवरही, कुशीनगर, उ. प्र.
kmpandey76@gmail.com
मैना: वर्ष - 7 अंक - 120 (अक्टूबर - दिसम्बर 2020)

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

मैना: भोजपुरी साहित्य क उड़ान (Maina Bhojpuri Magazine) Designed by Templateism.com Copyright © 2014

मैना: भोजपुरी लोकसाहित्य Copyright © 2014. Bim के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.