यार आपन चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह ’आरोही’ - आचार्य हरेराम त्रिपाठी ‘चेतन’

ऊ मई के दूपहरी रहे। हम भोजन करके आराम करत रहीं। अचके गेट खुलला के आवाज सुनिके गेट के ओर तकनी तऽ देखली कि एक आदमी पैन्ट-सर्ट पहिनले, हाथ में ब्रीफकेश लेले भीतर घुस रहल बा। सुभावकन हम आदर से कहनीं ‘आइल जाउ’ केकरा के खोजल जाता ? ओह आदमी के जिज्ञासा भरल प्रश्न रहे ‘चेतन जी के ईहे निवास हऽ? हम कहलीं- जी, आइल जाउ’ एगो कुर्सी व्यवस्थित करत हम ओने बढ़वनी। ऊ आदमी कुर्सी पऽ इत्मीनान से बइठि के ब्रीफकेश अपना दाहिना ओर रखिके रूमाल से अपना चेहरा पऽ चुहचुहाइल पसीना के पोंछत कहलस-'हमार नाँव चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह 'आरोही' हऽ। हम काँटाटोली के लगे नेताजी नगर से आ रहल बानी। बड़ा दूरि बा राउर घर।' हलुके हँसी के साथ हमहूँ कहली बात तऽ एके बा, नेताजी नगर एजियाँ से दूरि बा आ नेताजी नगर से हमार घर-आने मोराबादी दूर बा। 
चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह से पहिल मुलाकात आ शुरूआती परिचय एही तरी भइल सन्-1992 के मई में। दूनू ओर से परिचा-परिची नीकेतरी भइल। चाय आइल। ऊ ना पियले कहले हम चाह ना पिहीं, गुड़-पानी पियब। गुड़-पानी पी के भोजपुरी साहित्य पऽ बतकही शुरू भइल। साँच पुछीं तऽ हम भोजपुरी साहित्य श्रोता रहीं, वक्ता कवि चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह ‘आरोही’ जी ही रहीं। अपना लेखन के पूरा ब्योरा उहाँ के दिहलीं। हमरो से पूछलीं कि अबले राउर का-का छपल बा। तबले हमार दुगो किताब छपि चुकल रहे ’उबियान’ आ ‘फूल गंगबरार के’। 
ई पहिलका बइठकी हमनी दुनु आदमी के रहे। जमिके बतकही भइल। तब तक हमहूँ खूली गइल रहीं। छव बजे लागल तऽ चौधरी जी कहनी कि हम आपन किताब देत बानी आ जगो देत वानी रउवो आपन किताब ओतने दीं। हम जहाँ-जहाँ जाइब ऊहाँ-ऊहाँ साहित्यकार लोग के देवि। एह प्रस्ताव के हमहूँ मनली। छवगो आपन किताब ब्रीफकेश से निकासी उहाँ का देनी हमहूँ ’उबियान’ आ फूल गंगबरार के’ छव-छव प्रति देनीं किताबन के एह विनिमय बड़ा मिठास रहे। 
एहिजा ई बतावल जरूरी बा कि पाण्डेय कपिलजी के इहाँ हमरा किताबन के पहुँच चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह, 'आरोही' के जरिए भइल आने कि कविवर चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह 'आरोही' ऊ चिरई रही, ऊ तितली रहीं, ऊ भँवरा रही जे किताबन के, रचनाशीलता के, भोजपुरी साहित्य के रचनाकारन के परस्पर परागन करत चलेला। उहाँ चलते हम नेपाल के कवि आ साहित्यकार लोग जननी, मारिसस के साहित्यकार लोग के .नाँव कंठागर कइनी, पता लिखनी। पूरा भोजपुरी क्षेत्र के रचनाकार लो के विषय में 'के का आ केतना लिखले बा, लिखि रहल बा' ई सब के उहाँ के फैलावत रहीं। 
शुरूआती दौर में राँची जब उहाँका आई तऽ हमरा किहाँ एक दिन जरूर आई। बाद में क्रम बदलल तऽ अइला प फोन करीं। दण्ड-प्रणाम के बाद कहीं, ‘आई-आई निकली’, अइले-गइला से मेवा भेंटाला’’ ई उहाँ के ताकिया कलाम रहे। ओह घरी हमार साहित्यिक संस्था ‘नव परिमल’ सक्रिय रहे। उहाँ के आग्रह कइनी कि हमरा किहाँ एक दिन गोष्ठी करा दीं। कवि गोष्ठी भइल आ धूमधाम से भइल। तब मालूम परल कि ई कवि तऽ हिन्दी-गजलों लिखे आ पढे गावे में माहिर बा। एह तरी जिलेबी के सिरा जइसन, मीठ आ गाढ संबन्ध बनि गइल। हिन्दी दिवस के अवसर पर राजभाषा, विभाग में कवि गोष्ठी के आयोजन होत रहे। कवि-सूची में दू बेर उहाँ के हम नॉव के अनुशंसा कइनी। दूनो बेर कवि चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह ‘वशर’ के गजल आपन रंग जमवलसि। 
हमार आ चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह के बीच अन्तरंगता के जवन रंग तेयार भइल ओह में हमनी के दूनो आदमी परिवारो रंगा गइल। दुनो परिवार के मन-मस्तिस्क के कैनवस प कइ-कइगो संबन्ध के चटक चित्र तैयार हो गइल। ओह सभ रंगन्हि आ चित्रन्हि के चरचा अहथिर से आ विस्तार से कबो बाद में करबि।
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आचार्य हरेराम त्रिपाठी ‘चेतन’
मैना: वर्ष - 7 अंक - 120 (अक्टूबर - दिसम्बर 2020)

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