बाबूजी: भोजपुरी जेकर प्राण रहे - डॉ. स्वर्ण लता

बाबूजी चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह के संस्मरण लिखे बइठनी तऽ दिमाग में बचपन से लेके बाबूजी के निधन तक के स्मृति आँखी का आगा नाच उठल बाकिर शुरुआत कहाँ से करीं ई समझ नइखे आवत। हम दू भाई आ पाँच बहिन में नीचे से तीसरी हवीं। बाबूजी एगो सरकारी पदाधिकारी रहीं बाकिर गाँव से जुड़ाव हरदम रखनीं। ओकरा पीछे इहे सोच रहे कि गांव, माटी के संस्कार से हमनी के दूर ना रहे के चाहीं। बाबूजी दू भाई रहीं। चाचा बड़ रहलन। गाँव आ परिवार से उनकर लगाव रहे कि चाचा के निधन का बाद आपन तबादला गाँव के निकट प्रखंड/जिला में कराके गाँव से आ जा के कई बरिस ले सरकारी कर्तव्य के निर्वहन कइलन।
स्त्री शिक्षा आ बेटा- बेटी में बराबरी, दूनो चीज के उदाहरण खाली सैद्धांतिक रूप से ना व्यवहारिक रूप में उहाँ में भरल रहे। विपरित परिस्थितिओ में हमनी पाँच बहिन के पढ़ाई में बाधा ना आवे दिहलन। हम तऽ शादी के बाद उहाँ के कहला पर भोजपुरी में एमए आ पीएचडी कइनी। हमार शोध के विषय भोजपुरी बालगीत जेकरा में बाबूजी के सहयोग ना रहित तऽ हम पूरा ना कर पइतीं काहे कि भोजपुरी बाल गीत पर साहित्य आ सामग्री बहुत कम उपलब्ध रहे। पढ़ाई, लिखाई, खेल, भ्रमण, बाजार कवनो क्षेत्र होखे हर क्षेत्र में भाई लोग के बराबरी में हमनी पांचों बहिन के खाली मोके (मौका) ना दिहलन बलुक शादी के बादो हमनी केअपना पैर पर खड़ा होखे खातिर हर संभव मदद कइलन। हमरा घर में आज ले बेटा बेटी में कवनो फर्क ना बुझाइल।
भोजपुरी तऽ उनकर प्राण रहे। सांस से जुड़ल रहे। नहात, खात, सुतत, जागत भोजपुरी। आपन खा के, आपन खिया के दिन रात माई भाषा के सेवा कइलन। जहाँ रहनी भोजपुरी उनकर दुनिया रहल। हिन्दी भा कवनो भाषा के मंच होखे उहाँ का आपन प्रस्तुति भोजपुरी में देत रहनी। आरा में आपन घर वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय परिसर से सटल रहे। भोजपुरी एमए पीएचडी के शायदे कोई छात्र होई जेकरा के मदद ना कइले होइहन। हिन्दी लिखे वाला के भोजपुरी लिखे खातिर प्रोत्साहने ना बलुक माई भाषा खातिर लिखे के बाध्य करत रहलन। भोजपुरी के कवनो पत्रिका निकले तऽ ओकरा खातिर रचनाकार लोग से रचना लिखवा के भेजबे ना करस बलुक पत्रिका के एक-दू दर्जन प्रति मँगवा के बाँटसऽ भा बेच के पइसा भेजवा देस ताकि पत्रिका के कुछ आर्थिक मदद मिल जाए। लोग भोजपुरी के विश्वकोश, भोजपुरी के योगी, भोजपुरी के दधिचि के संज्ञा से संबोधित कइलस बाकिर उहाँ के उपाधि सम्मान के कागज के टुकड़ा का पीछे ना जाके एके लक्ष्य माई भाषा माथे पगड़ी खातिर दिन रात लागल रहनी। उहाँ का निधन ब्रेन हैमरेज से भइल। मृत्यु के समय भी तीन गो भोजपुरी सेवी के आपन नया लिखल कविता सुनावत रहीं कि कुर्सी पर एक तरफ गर्दन लटक गइल। आखिर भोजपुरी उनकर प्राण जे रहे।
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डॉ. स्वर्ण लता
मैना: वर्ष - 7 अंक - 120 (अक्टूबर - दिसम्बर 2020)

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